मारकाट मचाती राजनीति

चुनावी मौसम के अंतिम चरण में बंगाल अपने उन क्रान्तिकारी तेवरों में आ गया है जिसके लिए यह पूरे देश में जाना जाता है। यह भी संयोग है कि अंतिम चरण में उस राज्य ‘पंजाब’ की भी सभी 13 सीटों पर मतदान होगा जो अपने रणबांकुरों के लिए प्रसिद्ध है। दोनों राज्यों में यह भी गजब की समानता है कि इनमें से किसी में भी ‘बालाकोट सैनिक कार्रवाई’ कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। इनमें से बंगाल भारत का ‘दिमाग’ माना जाता है और पंजाब इसका ‘बाहुबल’। दोनों ही राज्यों ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ क्रान्तिकारी रास्ता अख्तियार किया।

पंजाब ने सरदार भगत सिंह दिये तो बंगाल ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस दिये। आगामी 19 मई को पंजाब के साथ ही प. बंगाल की कुल 42 में से शेष 9 सीटों के लिए भी मतदान होगा। वास्तव में मौजूदा लोकसभा चुनाव प. बंगाल के लिए कोई साधारण चुनाव नहीं हैं क्योंकि इनमें बंगाली अस्मिता के मुद्दे ने केन्द्रीय भूमिका शुरू से ही ले ली है। राज्य की मुख्यमन्त्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता दी ने चुनावी बिसात इस प्रकार बिछाई है कि उनकी पारंपरिक प्रतिद्वन्दी ‘मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी’ तमाशाई बन चुकी है। केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा भारी गाजे-बाजे और प्रचार से राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी को चुनौती दे रही है परन्तु यह चुनौती प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी में सीधे-सीधे सिमट गई है जिससे इस राज्य के लोकसभा चुनाव बहुत दिलचस्प हो गये हैं मगर मंगलवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा से होने वाला मतदान प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

इस रोड शो के खिलाफ जादवपुर विश्वविद्यालय के ‘ईश्वर चन्द्र विद्यासागर कालेज’ के छात्रों द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन जवाबी हिंसा में जिस तरह बदला उसे लेकर दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। इसमें कई छात्र जख्मी भी हुए और पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार भी किया परन्तु इस घटना में सबसे क्रूर कार्य यह हुआ कि बंगाल में ‘ऋषि तुल्य’ स्थान रखने वाले ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की कालेज प्रांगण के बाहर स्थित प्रतिमा को विद्रूप कर दिया गया। इसे लेकर पूरा बंगाल इस तरह बिफरा है कि राज्य की अन्य प्रमुख वामपंथी पार्टियां भी सड़कों पर आ गई हैं। क्योंकि प. बंगाल में हर शिशु उनके जीवन की उत्प्रेरक कहानियां सुनते और पढ़ते हुए बड़ा होता है। इस घटना का एक वीडियो तृणमूल कांग्रेस द्वारा बंगाल के घर-घर में वायरल करवाया गया है जिसमें कालेज प्रांगण में शाह के रोड शो के विरोध में नारे लगाते छात्रों की आवाज सुनकर भाजपा समर्थक कालेज का दरवाजा तोड़कर अंदर घुसते हैं और छात्रों से भिड़ते हुए मूर्ति पर भी प्रहार करते हैं जबकि दूसरी तरफ स्वयं भाजपा अध्यक्ष श्री शाह ने एक प्रेस कान्फ्रेंस करके वह चित्र दिखाया जिसमें भाजपा समर्थक दरवाजे के बाहर ही हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्य स्वयं तृणमूल कांग्रेस ने सहानुभूति बटोरने के लिये किया है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर वह महान हस्ती थे जिनके बारे में केवल बंगाल के ही नहीं बल्कि पूरे भारत के बालकों को कक्षा चार या पांच में ही पढ़ाया जाता था कि वह सादगी और विद्या के महासागर थे। महान समाज सुधारक थे जिन्होंने 19वीं सदी में अंग्रेजों को हिन्दू समाज में ‘विधवा विवाह’ के लिए कानून बनाने को मजबूर किया था और नारी शिक्षा के लिए जन आंदोलन खड़ा किया था। उनके बारे में कक्षा चार के पाठ्यक्रम में शामिल वह सचित्र कथा मुझे आज तक याद है जिसमें ‘एक रेलवे स्टेशन पर एक सूट-बूट पहने टाई लगाये एक बाबू हाथ मंे छोटी अटैची लिए कुली-कुली पुकारता है और धोती-कुर्ता पहने ईश्वर चन्द्र विद्यासागर उसकी बेताबी देखकर उसकी अटैची अपने सिर पर रखकर उसे गन्तव्य तक ले जाते हैं। जब वह उन्हें मजदूरी देने लगता है तो विद्यासागर उससे कोई पैसा नहीं लेते तो बाबू उनसे उनका नाम पूछता है और उनका नाम सुनते ही हक्का-बक्का रहकर गिड़गिड़ाने लगता है।

विद्यासागर उसे समझाते हैं कि अपना कार्य स्वयं करने से कोई व्यक्ति कभी छोटा नहीं होता।’ किन्तु राजनैतिक प्रतिद्वन्दिता की मार-काट मचाती राजनीति में भाजपा अध्यक्ष इससे पूर्व कोलकाता के समीप जयनगर की एक जनसभा में आवेश में यह कह गये कि ममता दी ने ‘शोनार बांग्ला’ को ‘कंगाल बांग्ला’ बना दिया। स्व. राजीव गांधी ने भी सत्ता में रहते हुए इतना भर कह दिया था कि ‘कलकत्ता शहर धंस रहा है।’ उनके इस कथन पर बवाल मच गया था। हकीकत यह है कि आर्थिक रूप से भी बंगाल पिछली सदियों में समृद्ध रहा है। 1911 तक ब्रिटिश इंडिया की राजधानी कोलकाता ही था। आजादी के बाद भी इसका औद्योगीकरण हुआ परन्तु 70 के दशक के बाद इसमें गिरावट आने लगी।

राजनीति से लेकर साहित्य, संगीत , अध्यात्म, विज्ञान आदि तक में यहां के मनीषियों ने भारत के मानचित्र को उजला किया। वह तो शुक्र है कि कहीं प्रसिद्ध वैज्ञानिक ‘जगदीश चन्द्र बसु’ की कोई प्रतिमा नहीं थी वरना उसे भी विद्रूप करके लोग पूछते कि यह जगदीश चन्द्र कोई बड़ा आदमी था क्या? बसु वह वैज्ञानिक थे जिन्होंने सिद्ध किया था कि पेड़-पौधों में भी जान होती है। वे भी हंसते, बोलते, सोते,जागते और गमजदा होते हैं। जिस बंगाल की यह महान विरासत हो उसे भला कोई कंगाल कैसे कर सकता है? मगर सियासत में जुबान कटार का काम कर रही है और ममता दी भी छुरी जैसी भाषा बोल रही हैं ! बिना किसी शक के जादवपुर विश्वविद्यालय के बाहर हुई हिंसक घटना की न्यायिक जांच कराई जानी चाहिए।

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