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अनलाक इंडिया का राष्ट्रीय एजेंडा

अनलाक इंडिया का राष्ट्रीय एजेंडा
आज से लाॅकडाऊन आंशिक रूप से उठ रहा है, इससे सामान्य जीवन के धीरे-धीरे पटरी पर लौटने में मदद मिलेगी मगर लाॅकडाऊन से देश को सबसे बड़ा सबक यह मिला है कि ‘भारत’ से ‘इंडिया’ अभी भी बहुत दूर है। चिन्तन का विषय यह भी है कि लाॅकडाऊन के दौरान 667 लोगों की मृत्यु केवल इसकी परेशानियों को झेलते हुए हुई। गंभीर मुद्दा यह भी है कि महामारी के दौर में भी मुनाफाखोरी के कई मामले सामने आये मगर सन्तोष की बात यह है कि इस दौरान पूरे भारत में भाईचारे और आपसी सहयोग के उद्धरणों ने आंखों में पानी ला दिया और भारत अपनी उन जड़ों से जुड़ा रहा जिसने इसे ‘भारत’ नाम दिया है। अब आगे का रास्ता इसलिए क​ठिन​ है क्योंकि 12 करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं औऱ भारत की आधी जनसंख्या ऐसी है जिसकी आमदनी प्रतिमाह पांच हजार रुपए के आसपास है।  घबराहट यह है कि लाॅकडाऊन देश में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 21.7 प्रतिशत से बढ़ा कर 40 प्रतिशत से ऊपर तक ले जा सकता है। परेशानी यह है कि 80 प्रतिशत भारतीय आबादी  नकद रोकड़ा से खाली हो चुकी है, सुखद यह है कि इसी आबादी के केवल एक कमरे के मकान में गुजारा करने वाले 44 प्रतिशत लोगों को चैन की सांस जीने का अवसर मिलेगा। सुखद यह भी है कि अब एक जगह से दूसरी जगह जाने पर लगी पाबन्दी खत्म होगी और बाजार खुलेंगे तथा वाणिज्यिक व औद्योगिक गतिविधियां शुरू होंगी।
 रोजमर्रा मेहनत करके पसीना बहाते हुए लोग हमें गली-मोहल्लों में आवाज लगा कर सामान बेचते हुए पुनः दिखाई देंगे मगर दुखद यह है कि बड़े शहरों में यह सब काम धंधा करने वाले लोग अपने-अपने गांवों को जा चुके होंगे और छोटी-मोटी उत्पादन इकाइयां बिना कामगारों के ही अपने मालिकों के सहारे अपनी मशीनें साफ कर रही होंगी। हो सकता है बाजार खुलें मगर ग्राहक नदारद रहें, छोटी उत्पादन इकाइयों की मशीने चलें मगर उनके बिजली के बिलों और जगह के किराये की अदायगी से मालिक की कमर टूट चुकी हो। यह कशमकश हमें सामाजिक जीवन में देखने को मिल सकती है। इसका इलाज करना ही अब सरकार का ‘राष्ट्रीय’ एजेंडा होगा। अन्ततः यह देश उन महात्मा गांधी का है जिनकी तस्वीर हर करेंसी नोट पर छपी रहती है। यह केवल इस बात की प्रतीक है कि समाज के सबसे गरीब आदमी की जेब में नोट होना चाहिए जिससे वह महात्मा के भारत का निर्माण कर सके।
सरकार का ध्यान अब इसी चिन्तन में लगना चाहिए क्योंकि यह देश उन महाऋषि ‘चरक’ का भी है जिन्होंने कहा था कि ‘ऋणं कृत्वा घृतम् पीवेत’ अर्थात संकट के समय यदि कर्ज लेकर भी जिन्दगी जीनी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए क्योंकि ‘कल’ किसने देखा है। हमारे ऋषि-मुनियों के नीति सूत्र हर काल और समय में सटीक बैठने वाले होते हैं और इन्हीं के आधार पर प्रचलित कहावतों का जन्म हुआ है जो बोलचाल की भाषा में आज भी गांवों में कही-सुनी जाती हैं। गांधी बाबा हमें सिखा कर गये कि लोकतन्त्र में सरकार की पहली जिम्मेदारी वंचितों व कमजोर लोगों को आर्थिक से लेकर सामाजिक सुरक्षा देने की होती है।
 जनता के स्वास्थ्य, भूख व अन्य दैनिक जरूरतों की आपूर्ति सुनिश्चित करना लोगों द्वारा चुनी गई सरकार का दायित्व होता है। इसे ही घुमा कर हमारे संविधान में ‘कल्याणकारी राज्य की स्थापना’ कहा गया। अतः मौजूदा हालात में राष्ट्रीय एजेंडा इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता कि लाॅकडाऊन में वंचित हुए लोगों को पुनः रोजगार से जोड़ कर उनके नुकसान की भरपाई की जाये। एक जमाना था जब समाजवादी चिन्तक डा. राम मनोहर लोहिया पं. नेहरू और इन्दिरा गांधी की सरकार से रोजगार भत्ता दिये जाने की मांग किया करते थे। हालांकि इसके विरोध में भी बहुत तीखा तर्क यह कह कर पेश किया जाता था कि इससे युवा वर्ग की कर्मशीलता कमजोर होगी और उसमें आगे बढ़ने की इच्छा मरेगी लेकिन इस मांग को तब की ‘भारतीय जनसंघ’ ने भी अपने एजैंडे में जगह देना उचित समझा था। लाॅकडाऊन ने सरकार के सामने ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है कि उसका राजस्व रोकड़ा इतना घट जायेगा कि उसे चालू वित्त वर्ष में 12 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बाजार से लेना पड़ेगा तब जाकर वह बजट में किये गये अपने वादे के अनुसार कुल 30 लाख करोड़ रुपए का खर्चा पूरा कर पायेगी मगर इससे लाॅकडाऊन के कारण जो आर्थिक तबाही पिछले 69 दिनों में मची है उसका घाटा कैसे पूरा होगा? लाॅकडाऊन के घाटे को पाटने का केवल एक तरीका ही बचता है कि सरकार बाजार से और ऋण लेकर वंचितों की मदद करे। यदि यह करने में वह असमर्थ हो तो अन्तिम रास्ता नये नोट छापने का बचता है। यहां महाऋषि चरक की नीति कारगर होती है क्योंकि हमें आज की चिन्ता करनी है और लाॅकडाऊन के मारे हुए लोगों की मदद करनी है। इस मामले में पूर्व वित्तमन्त्री पलानिअप्पन चिदम्बरम ने पहले ही दूर की कौड़ी फैंक कर महाऋषि चरक की नीति सामने रख दी ( मुझे नहीं मालूम कि उन्होंने चरक संहिता पढ़ी है या नहीं क्योंकि वह हारवर्ड विश्वविद्यालय के पढे़ हुए हैं और भारत में अंग्रेजी स्कूलों में ही उन्होंने शिक्षा अध्ययन किया है) परन्तु उनका विचार भारत की माटी से निकला हुआ ही समझा जायेगा। अतः ऐसा नहीं है कि हम इस समस्या का समाधान ही निकाल सकें। ध्यान सिर्फ यह रखना होगा कि आज जब ‘खेत’ पर ही ‘गाज’ गिर रही है तो हम ‘खलिहान’ की सुरक्षा की चिन्ता न करें। भारत इस मायने में सौभाग्यशाली देश कहा जायेगा कि इसका प्रधानमन्त्री स्वयं बचपन में गरीबी और मुफलिसी में पल-बढ़ कर बड़ा हुआ और चाय बेच कर उसने अपनी आजीविका कमाई। अतः वित्तमन्त्री को बिना कोई समय गंवाये ‘अनलाक इंडिया’ को ‘रोकड़ा’ से भरपूर करने की स्कीम तैयार करनी चाहिए  और उन गरीब-गुरबों की दुआएं बटोरनी चाहिएं जिनके वोट से यह सरकार बनी है और यह पता लगाना चाहिए कि सरकार ने अभी तक जो इमदाद गरीबों को दी है वह कितने लोगों तक पहुंची।
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