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भाजपा का नया अध्यक्ष 15 दिसंबर से पहले?

04:00 AM Nov 30, 2025 IST | त्रिदीब रमण
भाजपा का नया अध्यक्ष 15 दिसंबर से पहले

‘पिछले मौसमों के निशां इकट्ठे कर इस सवेरे को
आसमां के माथे पर बड़ी शिद्दत से सजाया है हमने
सुबह जब सूरज के ज़ख्मों से लहू रिसे तो समझना
इसे किस-किस की बुरी नज़रों से बचाया है हमने’
भाजपा के नए अध्यक्ष को लेकर इतने कयास लग चुके हैं कि अब तो नेपथ्य की आहटों के हौंसले भी चूकने लगे हैं पर इस शनिवार जिस अफरा-तफरी में भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में अवस्थित के. लक्ष्मण के ऑफिस के ताले को खोला गया है और उसे इतनी शिद्दत से झाड़-पोंछ कर चमकाया गया है कि नेपथ्य की गलियों में बेसुध पड़े कयासों के फिर से पैर लग गए हैं। खबरें सुनाई देने लग गई हैं कि इस 15 दिसंबर से पहले भाजपा को उसका नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल जाएगा, क्योंकि 15 दिसंबर के बाद ‘खरमास’ शुरू हो जाएगा और इस अवधि में किसी शुभ कार्य का श्रीगणेश नहीं किया जाता, अगर 15 दिसंबर तक अगले अध्यक्ष का ऐलान नहीं होता है तो फिर इसके लिए भगवा पार्टी को अगले वर्ष 14 जनवरी तक यानी मकर संक्रांति तक इंतजार करना पड़ सकता है। चूंकि आने वाले कुछ महीनों में केरल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी जैसे कुछ राज्यों में चुनाव होने हैं। सो, इसके लिए अध्यक्ष को अपनी नई टीम भी बनानी पड़ेगी। सनद रहे कि के. लक्ष्मण फिलहाल भाजपा के चुनाव अधिकारी हैं, सो नए पार्टी अध्यक्ष के चुनाव की जिम्मेदारी यकीनन उनके कंधों पर ही पड़ेगी, वहीं चंद पुराने नाम अध्यक्षीय दौड़ में शामिल बताए जाते हैं, मनोहर लाल खट्टर, धर्मेंद्र प्रधान व भूपेंद्र यादव के नाम पहले से चल रहे थे। बिहार चुनाव में मिली बंपर जीत के बाद धर्मेंद्र प्रधान का दावा किंचित थोड़ा और मजबूत हो गया है। सूत्रों की मानंे तो भाजपा के संगठन महामंत्री बी.एल. संतोश ने पिछले दिनों अमित शाह से मिलकर अपने गृह राज्य कर्नाटक से प्रहलाद जोशी का नाम अध्यक्षीय रेस में शामिल करवाया है, वहीं यह भी कहा जा रहा है कि स्वयं पीएम की राय एक दलित अध्यक्ष बनाने की है, पिछले कुछ समय से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जिस तरह पिछड़ा व दलित राग अलाप रहे हैं, उसे देखते हुए मोदी की यह सोच राहुल को काउंटर करने की हो सकती है। इस कड़ी में ताजातरीन नाम राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल का उभर कर सामने आया है, जो दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।
भाजपा के हाथों क्यों मजबूर हैं थरूर?
शशि थरूर शायद अब तक की सबसे बड़ी सियासी पारी खेल रहे हैं। भाजपा के संग गलबहियां करते आज वे इतने आगे आ गए हैं कि उनके लिए वापिस अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस से तार जोड़ पाना निहायत ही मुश्किल हो गया है। इससे पूर्व भी उनकी कालांतर में भाजपा चाणक्य से कई मुलाकातें हो चुकी हैं। उनके समक्ष थरूर अपने उद्गार पहले ही व्यक्त कर चुके हैं। दरअसल, थरूर चाहते हैं कि वे लोकसभा सीट छोड़ने के साथ-साथ कांग्रेस को भी अलविदा कह दें। बदले में उन्हें भाजपा राज्यसभा से लाकर केंद्र में मंत्री बना दें, साथ ही उन्हें केरल में अपना ‘सीएम फेस’ भी प्रोजैक्ट कर दे। थरूर को उम्मीद थी कि भाजपा इसी बार उन्हें कश्मीर के रास्ते ऊपरी सदन में ले आएगी, पर ऐसा कुछ हो नहीं पाया। उल्टे भाजपा शीर्ष की ओर से उन्हें बता दिया गया है कि भाजपा अन्य दलों से आए व्यक्ति को तुरंत अपने यहां मंत्री नहीं बनाती, यहां तक कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी इसके लिए एक वर्ष का इंतजार करना पड़ गया था। वह भी उस सूरत में जबकि वे अपने साथ मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार ही भाजपा में लेकर आ गए थे, फिर थरूर से कहा गया कि वे अपनी लोकसभा सीट से इस्तीफा देकर भाजपा के सिंबल पर तिरूवनंतपुरम से उपचुनाव लड़ जाएं इससे केरल में भाजपा के पक्ष में माहौल बन जाएगा। कहते हैं थरूर ने भाजपा के इस प्रस्ताव पर हामी नहीं भरी है और वे नाराज़गी का भाव लिए घर बैठ गए। इसके बाद भाजपा शीर्ष ने जेपी नड्डा को थरूर को मनाने के अभियान में लगाया। इस दफे जब नड्डा दुबई जा रहे थे तो वे इस यात्रा से पूर्व थरूर से मिले। थरूर से कहा गया है कि वे ‘लीप ऑफ फेथ’ पर भाजपा ज्वाइन कर लें, यहां उनका पूरा ध्यान रखा जाएगा और नहीं तो वे ‘केरल कांग्रेस’ के नाम से अपनी एक क्षेत्रीय पार्टी का गठन कर लें और केरल की सभी 140 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दें, जिससे कांग्रेस की राहें वहां मुश्किल हो सकें। इस पर थरूर ने कहा कि ‘अगर उन्हें अलग पार्टी ही बनानी थी तो यह काम उन्हें डेढ़-दो साल पहले कर लेना चाहिए था, अब तक वे अपनी पार्टी का छोटा-मोटा संगठन खड़ा कर लेते, पर ऐन चुनाव से पहले अगर उन्होंने अपनी रीजनल पार्टी बनाने का ऐलान किया तो केरल के लोग सोचेंगे कि मैं भाजपा के हाथों में खेल रहा हूं।’ इस मीटिंग से भी जब कुछ नहीं निकला तो नड्डा दुबई के लिए उड़ लिए। और थरूर अब तलक अपने सपनों की उड़ान के लिए कुलांचें भर रहे हैं।
दिलीप के दिल में क्या है?
पश्चिम बंगाल की लाल माटी में भगवा बीजों को अंकुरित-पल्लिवत करने में संघ-भाजपा के इस खांटी नेता दिलीप घाेष की एक महती भूमिका रही है। बंगाल में भाजपा के वोट शेयर को 4 फीसदी से उठाकर 39.1 फीसदी तक करने में घाेष ने भी अपना खूब खून-पसीना लगाया है। पर जब कुछ वर्ष पहले शुभेंदु अधिकारी भाजपा शीर्ष की आंखों का तारा में शुमार हो गए तो घोष आहिस्ता-आहिस्ता राजनीतिक हाशिए पर चले गए, पिछले लोकसभा में तो उनको जीती हुई सीट से बेदखल कर कहीं ओर से चुनाव लड़वा दिया गया और वे यहां से पराजित हुए। इस हार के बाद तो पार्टी ने लगभग उन्हें बिसरा ही दिया। इस बात से घोष इतने व्यथित हुए कि वे सीधे तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी से मिलने जा पहुंचे और उनसे कहा कि अगर उन्होंने तुणमूल ज्वॉइन कर लिया तो बंगाल भाजपा में दोफाड़ हो जाएगा। भाजपा के 18-22 नेता उनके साथ ममता को ज्वाइन कर सकते हैं। इसमें से तो 10 भाजपा के निवर्तमान विधायक ही हैं। एक ओर जहां ममता और सौगत राय जैसे उनके पुराने सहयोगी घोष को तुणमूल में लेने को तैयार दिखते हैं तो अभिशेक बनर्जी घोष के विरोध का अलख जगा रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा में रहते घोष ने ममता व तृणमूल पर ‘बिलो द बेल्ट’ हमला किया है, जिसके लिए इन्हें कभी माफ नहीं किया जा सकेगा, वहीं ममता के पुराने सहयोगियों का मानना है कि तृणमूल पर अब जबकि केवल मुस्लिम हितैषी पार्टी होने का ठप्पा लग रहा है, पार्टी ने अपने झंडे से केसरिया गायब कर उसे पूरी तरह हरा बना दिया है तो ऐसे में घोष के आने से हिंदू वोटर्स भी तृणमूल के साथ आ सकते हैं।
इस बीच जैसे ही दिल्ली को घोष की मुलाकातों और इरादों का पता चला उन्हें फौरन राजधानी तलब किया गया। भाजपा चाणक्य ने उनसे कहा पार्टी में जल्द ही उन्हें सम्मानजनक तरीके से एडजस्ट किया जाएगा। मार्च में उन्हें राज्यसभा देने पर भी विचार हो रहा है। कहते हैं इस प्रस्ताव पर घोष ने बस इतना ही कहा कि एक बार उनकी मीटिंग पीएम से करवा दी जाए, यही बातें बस वे पीएम के मुख से सुनना चाहते हैं।
गौतम को लेकर गंभीर संकट
भारतीय क्रिकेट टीम के कोच गौतम गंभीर को लेकर गंभीर सियासी मंथन का दौर जारी है। कभी वे भाजपा के एक प्रमुख नेता रहे अरुण जेटली के बेहद करीबियों में शुमार होते थे, इसी वजह से उन्हें दिल्ली में भाजपा सांसद रहने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ, पर उनकी अधीर व निरंकुश कार्यशैली की वजह से उनके सियासी सफर के अधबीच ही भाजपा ने उन्हें बाहर का दरवाज़ा दिखा दिया। फिर भाजपा शीर्ष की मेहरबानियों की वजह से उन्हें राहुल द्रविड़ जैसे सुलझे हुए कोच की जगह दे दी गई। उनके बारे में कहा गया है कि उनके अंदर एक गजब का ‘किलर इंस्टिंक्ट’ है, पर अभी पिछले दिनों साऊथ अफ्रीका ने भारत को अपनी ही स्वदेशी जमीन पर जिस तरह पटक-पटक कर धोया उससे गंभीर की काबिलियत पर भी सवाल उठने लगे। खासकर चंद भारतीय स्टार खिलाड़ियों को लेकर उनके गैर पेशेवर व्यवहार ने बीसीसीआई को भी चौंका दिया है। वे ड्रेसिंग रूम में जिस कदर कथित तौर पर अपने खिलाड़ियों पर ही बुरी तरह पिल पड़े इससे भारतीय खिलाड़ियों के हौसले भी पस्त बताए जाते हैं। ड्रेसिंग रूम से एक उड़ती-उड़ती खबर यह भी आयी कि भारत के वनडे टीम के एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी को ‘नेवला’ नाम से पुकारा जाता है।
एक खबर यह भी आई कि विराट कोहली के बड़े भाई ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट डाल कर मौजूदा कोच की ओर इशारों-इशारों में खूब लानते-मलानतें भेजी थीं। कहा जाता है कि उनके भाई को दबाव में टेस्ट व टी ट्वेंटी क्रिकेट से संन्यास लेना पड़ा, अभी उनके अंदर काफी क्रिकेट बचा हुआ है।
कहते हैं जब विराट दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे तो उन्होंने वहीं से अपने भाई से यह पोस्ट तुरंत डिलीट करने को कहा, क्योंकि वे आगे इस व्यक्ति से कोई और पंगा नहीं चाहते। सो, आने वाले दिनों में भारतीय क्रिकेट टीम का माहौल बदले या न बदले, कोच तो जरूर बदला जा सकता है।
तुुम ही सर्वत्र हो केशव!
यह खबर सुनने में थोड़ी अजीब सी लगती है कि किसी एक व्यक्ति की वजह से पिछले सप्ताह आहूत यूपी कैबिनेट की मीटिंग स्थगित कर दी गई। आमतौर पर ऐसी बैठक की तारीख का फैसला मुख्यमंत्री सचिवालय करता है और तमाम मंत्रियों को एडवांस में इस बात की इतला भेज दी जाती है। इस बार जब कैबिनेट की मीटिंग की डेट जारी हुई तो राज्य के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद उपलब्ध नहीं थे, वे प्रवास पर थे। उन्हें इस बात से गहरी पीड़ा पहुंची कि उनसे पूछे बगैर ही हर बार यह डेट जारी हो जाती है, सो उन्होंने भी तुरंत दिल्ली अपनी यह शिकायत पहुंचा दी कि सीएम आफिस उनकी उपलब्धता को जांचे बगैर ही कैबिनेट मीटिंग की डेट पक्की कर देता है। तब जाकर दिल्ली से लखनऊ यह निर्देश आया है कि बैठक की कोई तिथि मुकर्रर करने से पहले दोनों डिप्टी सीएम की उपलब्धता भी पूछनी अनिवार्य है, क्योंकि सीएम और दोनों डिप्टी सीएम की सामूहिक रूप से राज्य चलाने की जिम्मेदारी है। सो, दिल्ली की ओर से यह भी सलाह आई है कि सीएम और दोनों डिप्टी सीएम मिला कर तीन लोगों का एक व्हाट्सऐप ग्रुपहोना चाहिए जिससे महत्वपूर्ण जानकारियां आपस में साझा हो सकें।
दिल्ली केशव प्रसाद मौर्या को दो बातों के लिए महत्व देता है एक तो इससे योगी बैलेंस होते हैं, दूसरा पिछड़े वोटरों से सीधा कनेक्ट स्थापित करने की दृश्टि से, हालांकि लोकसभा चुनाव और उससे पहले के चुनावों में भी मौर्य वोट शिफ्ट होकर सपा को चले गए थे। 22 के चुनाव में तो मौर्या ने अपनी सिराथु की सीट भी सपा समर्थित पल्लवी पटेल के हाथों गंवा दी थी।

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त्रिदीब रमण

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