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परंपरागत सिगरेटों पर प्रतिबंध के लिए SC जाने की तैयारी में एनजीओ

परंपरागत सिगरेटों पर प्रतिबंध के लिए SC जाने की तैयारी में एनजीओ
स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों के मद्देनजर इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट को सरकार द्वारा प्रतिबंधित करने के बाद दो गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) पारंपरिक सिगरेटों और अन्य तंबाकू उत्पादों के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई किये जाने के अनुरोध को लेकर उच्चतम न्यायालय जाने की योजना बना रहे है। 

इन संगठनों की दलील है कि ये उत्पाद अधिक हानिकारक हैं। 

दिल्ली के एनजीओ यूनाइटेड रेजिडेंट ज्वाइंट एक्शन (ऊर्जा) और हैदराबाद के संगठन ‘वीचेंजयू’ एक याचिका और ‘क्लास सूट’ दायर करने की प्रक्रिया में है जिसमें वे धूम्रपान से संबंधित बीमारियों के कारण पीड़ित लोगों के लिए पांच लाख रुपये, और परिवार के कमाने वाले सदस्य को खोने वालों के लिए 10 लाख रुपये के मुआवजे की मांग कर रहे हैं। 

सरकार ने हाल में एक अध्यादेश जारी किया था जिसके तहत ‘‘वैकल्पिक’’ धूम्रपान उपकरणों के उत्पादन, विनिर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, विक्रय, वितरण, भंडारण और विज्ञापन को संज्ञेय अपराध बनाया गया था। 

‘इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट (उत्पादन, विनिर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, विक्रय, वितरण, भंडारण और विज्ञापन) प्रतिषेध विधेयक, 2019 को बुधवार को लोकसभा ने मंजूरी दी थी। 

वीचेंजयू के संस्थापक और अध्यक्ष विजय भास्कर येतापु ने कहा कि सरकार के निर्णय से कार्यकर्ताओं और तंबाकू की लत से ग्रस्त लोगों के लिए एक अनुकूल अवसर पैदा हुआ है क्योंकि ‘‘सरकार निकोटिन की लत संबंधी बीमारियों के प्रति संवेदनशील है जो उसके विभिन्न रूपों के बीच भेदभाव नहीं करेगी।” 

उन्होंने कहा, ‘‘ अगर ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, तो पारंपरिक तंबाकू सिगरेट और बीड़ी पर भी लगाया जा सकता है - जो स्पष्ट रूप से कैंसर या ऐसी बीमारियों का कारण बनती हैं, जिससे मौत होती हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों में कहा गया है कि तंबाकू धूम्रपान से हर वर्ष 12 लाख लोगों की मौत होती हैं। ई-सिगरेट के उपयोग के संबंध में अभी तक चिकित्सकीय या वैज्ञानिक रूप से ऐसा कोई आंकड़ा या संबंध स्थापित नहीं हुआ है।’’ 

एनजीओ ने कहा कि वह उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के पास गये थे और उन्होंने उनके मामले को उठाने पर सहमति दी है। 

भूषण ने कहा, ‘‘यह वास्तव में उल्लेखनीय है कि सरकार ने ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने को चुना है जिसका पहले तो जनसंख्या के 0.1 प्रतिशत लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है और दूसरी बात यह कि ये परंपरागत सिगरेटों की तुलना में कम नुकसानदायक है क्योंकि इनमें तंबाकू या ‘टार’ नहीं होता और केवल निकोटिन होता है।” 

उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए ई-सिगरेटों की तुलना में परंपरागत सिगरेटों के स्वास्थ्य पर अधिक प्रभाव पड़ते हैं। इसके अलावा, इन वैकल्पिक धूम्रपान उपकरणों पर प्रतिबंध से तंबाकू उद्योगों को मदद मिलती दिख रही है क्योंकि ई-सिगरेट का सेवन करने वाले लोगों के पारंपरिक सिगरेट का इस्तेमाल फिर से शुरू किये जाने की संभावना है और यही कारण है कि इस विधेयक को लोकसभा की मंजूरी मिलने पर तंबाकू कंपनियों के शेयरों में 20 प्रतिशत का उछाल आया।’’ 

‘ऊर्जा’ के अध्यक्ष अतुल गोयल ने आरोप लगाया कि पूर्ण स्वामित्व वाली संस्थाओं के माध्यम से सरकार उन कंपनियों में भागीदार है जो सिगरेट का उत्पादन, प्रचार और बिक्री करती हैं। 

उन्होंने कहा, 'जो सरकार सिगरेट की बिक्री से मुनाफा कमाती है, वह लत को बढ़ावा देती है। नशा घातक होता है, सरकारों के स्वयं के आकलन में, हर साल 12 लाख मौत होती हैं और उसे इन मौतों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।’’ 

उन्होंने कहा कि ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाये जाने संबंधी सरकार के फैसले के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा था और इसके साथ-साथ परंपरागत सिगरेटों पर भी प्रतिबंध लगाये जाने का आग्रह किया था। 
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