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हे कृष्णा तुम्हे आना ही होगा...

बहुत सदियों पहले कृष्णा ने द्रौपदी की लाज बचाई थी, उसकी साड़ी की रक्षा की थी। मुझे लगता है कि कुछ चंद लोग इसे भूल गए हैं, साड़ी की महत्ववता भूल गए हैं।
हे कृष्णा तुम्हे आना ही होगा...
बहुत सदियों पहले कृष्णा ने द्रौपदी की लाज बचाई थी, उसकी साड़ी की रक्षा की थी। मुझे लगता है कि कुछ चंद लोग इसे भूल गए हैं, साड़ी की महत्ववता भूल गए हैं। साड़ी भारतीय संस्कृति की प्रमाण है। साड़ी स्त्री की लज्जा व सम्मान है। नारी का स्वाभिमान है, एक बहुत ही सम्मानित पहवाना है। वैसे तो मेरी नजर में हर पहरावा जो स्त्री के तन को ढके हुए हो वो सम्माजनक है। मैंने हर तरह के पहनावे पहने हैं और पहनती भी हूं परन्तु हमेशा इस बात को जहन में रखती हूं कि तन ढका होना चाहिए। हर पहनावा मर्यादा में होना चाहिए। यह भारतीय स्त्री की पहचान है, चाहे वो स्मार्ट ड्रेस पहने, जिंस पहने, सूूट पहने या साड़ी पहने। वास्तविकता में साड़ी को हमेशा महत्वता मिली है, क्योंकि यह सबसे शालिन ड्रेस मानी जाती है।
मुझे आज भी याद है जब मेरी नई-नई शादी हुई थी तो मेरे ससुर पिता के एक मित्र जो डाक्टर थे उनकी विदेशी बहू जेनट (परमिन्द्र सिंह की बहू) अमेरिका से आई थी। मुझसे जब मिली तो मैंने साड़ी पहनी हुई थी जो उसे बहुत पसंद आई। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसे साड़ी पहनना सीखा सकती हूं? तो मैंने उसे सिखाई। तब से लेकर आज तक उसके साथ मेरा इतना प्यार है कि उसने अपनी बेटी का नाम भी किरण रखा और वो कैलिफोर्निया में रहती है और अब भी साड़ी पहनती है। कहने का भाव है ​कि विदेशियों को भी हमारे पहनावे आैर साड़ी से प्यार है तो हमारे भारतीयों को क्यों नहीं।
हमारे ही अखबार में जब यह पहले दिन एक्सक्यूलिसिव खबर छपी ​िक एक रेस्तरां में एक महिला को इसलिए अन्दर जाने से रोका गया तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैंने अपने रिपोर्टर को फोन करके पूछा तो उसने मुझे प्रूफ तक भेज ​िदए। सच में पूछो तो अभी भी लगता है कि इतनी छोटी मानसिकता एक भारतीय की कैसे हो सकती है। मुझे पूरी उम्मीद है कि उस रेस्तरां के मालिक की मां, बहन, पत्नी भी साड़ी जरूर पहनती होंगी तो यह कैसे और क्यों हुआ। साड़ी तो भारत की बहुत ही पापुलर आैर ट्रेि​डशनल ड्रेस है जो भारतीय नारी की सुन्दरता और शान की पहचान है। मुझे लगता है रेस्तरां के मालिक या उसके कर्मचारियों से बहुत बड़ी गलती हुई है। इस गलती का सुधार यही है कि वो माफी मांगते हुए (मैंने सुना है शायद उसने मांगी है) उसे सिर्फ अब साड़ी वाली महिलाओं के लिए ही अपना रेस्तरां खोलना चाहिए। यही उसकी माफी होगी।
क्योंकि यह केवल एक महिला का अपमान नहीं, साड़ी का अपमान नहीं, भारतीय परम्पराओं का अपमान है। भारत की साड़ी देश-विदेशों में मशहूर है। अब तो बंधी यानी तैयार साड़ियां मिलती हैं, क्योंकि विदेशों में लोग इसे पहनना पसंद करते हैं। यही नहीं स्कूल में जब टीचर डे मनाया जाता है तब युवा लड़कियां इतने उत्साह से स्वाभिमान से साड़ियां पहनती हैं, वो दिन उनकी जिन्दगी का बहुत ही महत्वपूर्ण दिन होता है। वो अपने आपको बड़ा और जिम्मेदार महसूस करती हैं।
‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।’’
वैसे भी नवरात्रे आ रहे हैं। सभी देवियों को पूजा जाएगा तो घर की यानी अपने देश की नारी का अपमान क्यों। याद रखना चाहिए नारी देवी का रूप है। समय आने पर दुर्गा भी बन जाती है। मैंने देखा कि बहुत सी महिलाओं ने प्रदर्शन किया। महिला आयोग भी आगे आया। क्योंकि यह एक नारी की साड़ी का अपमान नहीं पूरी भारत की महिलाओं की साड़ी का अपमान है। मैं तो उस रेस्तरां के मालिक को यही सलाह दूंगी कि वो कुछ ऐसा करें कि लगे उससे गलती हुई और वो दिल से माफी चाहता है। नहीं तो फिर से कृष्ण को साड़ी की लाज बचाने इस धरती पर आना होगा।
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