+

एक ‘जान’, एक ‘प्राण’, एक ‘देश’

एक ‘जान’, एक ‘प्राण’, एक ‘देश’
यह देश महात्मा गांधी की विरासत के साये में आजादी मिलने के बाद से ही जीता आ रहा है और आगे भी इस अहिंसा के महान पुजारी के सिद्धान्तों के प्रति नतमस्तक होकर अपना सफर तय करता रहेगा। यह प्रमाण महात्मा गांधी ही इस देश की महान जनता के लिए छोड़ कर गये थे कि जब सीमा पर कोई खतरा हो तो ‘राष्ट्रधर्म’ केवल उसकी सुरक्षा करने का होता है। बापू ने अपने जीवन मे केवल एक बार ही हिंसा की वकालत की थी और वह भारत की सीमाओं की रक्षा को लेकर की थी। 1947 में स्वतन्त्रता मिलने के बाद जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया और महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत का भारतीय संघ में विलय कर दिया तो महात्मा गांधी ने प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू से कहा था कि ‘देश की फौजों को सीमाओं की रक्षा करने के लिए अपने सैनिक धर्म का पालन करना चाहिए। सीमाओं की रक्षा के लिए लड़ना सैनिक का धर्म होता है। अतः फौजों को सीमाओं पर भेज कर पाकिस्तानी हमले को विफल बना देना चाहिए।’ राष्ट्रपिता ने तब पूरे देश के समक्ष स्पष्ट कर दिया था कि अहिंसा का अर्थ न कमजोरी होता है और न भीरूपन। राष्ट्र रक्षा के लिए प्रत्येक व्यक्ति और संस्था को अपने-अपने दिये गये दायित्व को पूरा करके निभाना चाहिए मगर इतिहास सबक सीखने के लिए होता है। 21वीं सदी का दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहा जाने वाला देश भारत अचानक 16वीं सदी के उस दौर में प्रवेश नहीं कर सकता जब घरेलू राजे-रजवाड़े विदेशी आक्रान्ता के दरवाजे पर खड़ा होने  के बावजूद आपस में ही लड़ते रहते थे और उसका लाभ आक्रमणकारी ताकतें उठाती थीं।  
भारत की अन्तर्कलह की वजह से ही अंग्रेजों ने हमें अपना दो सौ वर्ष तक गुलाम बनाये रख कर हमारे स्वाभिमान को कुचल डाला और सभी राजे-रजवाड़ों को अपने हुक्म का गुलाम बना ​िलया मगर आज भारत की फौजें दुनिया की सबसे अनुशासित और ताकतवर फौजों में गिनी जाती हैं। अपने शौर्य से इसके वीर सैनिकों ने ‘चट्टानों’ को भी ‘गेंद’ की तरह उछाला है, इन्हीं की वीरता की कहानी इतिहास में इस तरह दर्ज हो चुकी है कि दुश्मन की फौजों ने घुटनों के बल बैठ कर अपनी जान-माल की भीख मांगते हुए हथियार डाल कर आत्मसमर्पण किया (1971 का बंगलादेश युद्ध)। यही वह जय हिन्द की सेना है जिसने 1967 और 2013 में चीनी सेना को भारतीय इलाकों में घुसपैठ करने पर मुंहतोड़ जवाब देते हुए उसकी हदों में सिमटा दिया मगर दुर्भाग्य है कि आज चीन फिर से लद्दाख की गलवान घाटी से लेकर काराकोरम दर्रे तक घुसपैठ कर रहा है और हमारे देश की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस पार्टी आपस में ही पिछला हिसाब-किताब बराबर करने की रंजिश में लगी हुई हैं। गड़े मुर्दे उखाड़ कर राजनीति करने की यह बिसात हम बाद में भी बिछा सकते हैं और एक-दूसरे से हिसाब-किताब मांग सकते हैं। फिलहाल सबसे बड़ा शत्रु चीन है, जो भारत माता की छाती पर चढ़ने की जुर्रत कर रहा है। भारतीय क्षेत्रों से उसे बाहर खदेड़ना सभी राजनीतिक दलों का आज पहला कर्त्तव्य है और राष्ट्रधर्म है। आपस में लड़ने से दुश्मन का मनोबल बढ़ता है।  यह हकीकत क्या भाजपा व कांग्रेस को बयान करनी पड़ेगी? हमें आज चीन से लड़ना है और यही प्रत्येक भारतवासी की इच्छा है कि चीन की फौजों को वापस उसकी सही जगह भेजा जाये और भारतीय सेना को माकूल जवाब देने की खुली छूट दी जाये मगर क्या कयामत है कि चीनी सैनिक फिर गलवान घाटी के उसी इलाके में डेरा डाल कर बैठ गये हैं जिसे मुक्त कराने के लिए कर्नल बी. सन्तोष बाबू ने अपने 19 सैनिकों के साथ शहादत दी। इतना ही नहीं चीनियों ने इससे भी ऊपर अक्साई  चिन से लगते काराकोरम दर्रे के निकट दौलतबेग ओल्डी के भारतीय देपसंग घाटी क्षेत्र में भी नियन्त्रण रेखा के 18 कि. मीटर तक अन्दर आकर अतिक्रमण कर लिया है और इस इलाके में भारत द्वारा बनाये गये दुनिया के सबसे ऊंचे हैली पैड को अपने निशाने पर रखा हुआ है। यह 1962 का नहीं बल्कि 2020 का भारत है जो चीन की किसी भी बदनीयती का जवाब शोले की मानिन्द देना जानता है मगर हम तो आपस में लड़ने को अपना धर्म मान रहे हैं और अगला-पिछला हिसाब अभी चुकता करने पर आमादा दिखाई पड़ते हैं।  क्षमा कीजिये जब देश की सीमाओं पर संकट हो तो पूरा देश सेना के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़ा हो जाता है और दुश्मन से अपनी धरती खाली कराने की ठान लेता है। भारत का बच्चा-बच्चा जानता है कि आज पूरे देश को चीन से सबसे बड़ा खतरा है।  क्या इतनी सी बात राजनीतिक दलों की समझ में नहीं आ रही कि- 
‘‘खतरे में हो देश अरे तब लड़ना सिर्फ ‘धरम’ है, 
मरना है क्या चीज आदमी लेता नया ‘जनम’ है।’’
भारत की सेना के लिए इस देश का हिन्दू-मुसलमान और सिख, पारसी, ईसाई इस तरह आदर भाव रखता है कि सेना के हवलदार को देख कर ही गौरव से सीना तान लेता है और उसके सामने नतमस्तक होने को अपनी शान समझता है। यह समय समवेत स्वर में केवल और केवल ‘जय हिन्द’ कहने का है जो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हमें सिखा कर गये हैं। अतः सभी राजनीतिक दलों को अपने-अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए। राष्ट्रीय सीमाओं पर संकट के समय स्वतन्त्र भारत की यह परंपरा रही है कि पूरा देश सेना के साथ खड़े होकर केवल यही गाता है,
‘‘एक जान है एक प्राण हैं  पूरा देश हमारा
नदिया चल कर थकी रुकी पर कभी न गंगाधारा’’। 
मगर देखिये चीन की चालाकी कि एक तरफ तो वह नियन्त्रण रेखा पर तनाव कम करने की बातचीत कर रहा है और दूसरी तरफ दबचोक से लेकर दौलत बेग ओल्डी तक खिंची नियन्त्रण रेखा को बदलने के लिए गलवान घाटी से लेकर पेगोंग-सो झील और काराकोरम दर्रे तक जगह-जगह सैनिक जमावड़ा करके घुसपैठ कर रहा है।  यदि ऐसा न होता तो भारत के विदेश मन्त्रालय को 20 जून को यह क्यों कहना पड़ता कि भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ को रोका जाये और 25 जून को यह वक्तव्य क्यों जारी करना पड़ता कि यदि नियन्त्रण रेखा पर यही स्थिति रही तो दोनों देशों के सम्बन्धों पर इसका बहुत खराब असर पड़ेगा। एक तरफ जब स्वयं विदेश मन्त्रालय यह चेतावनी दे रहा है तो दूसरी तरफ अपने ही घर में राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे को नीचा दिखाने की जुगत में लगी हुई हैं और गड़े मुर्दे उखाड़ रही हैं।  विदेशी खतरे के चलते स्वतन्त्र भारत में आज तक ऐसा नजारा कभी देखने को नहीं मिला जिसे देख कर दर्जे दस का छात्र भी कहने लगे कि इन राजनीतिक ‘बच्चों’ को फिर से स्कूल में भर्ती कराओ। इसलिए आज समवेत स्वर से कहो-जय हिन्द और जय हिन्द की सेना।
facebook twitter