राज्यसभा में विपक्षी दलों ने ट्रांसजेन्डर विधेयक को प्रवर समिति में भेजने की मांग की

07:53 PM Nov 21, 2019 | Shera Rajput
राज्य सभा में ट्रांसजेन्डर के अधिकारों को सुनिश्चित करने तथा उनके खिलाफ हिंसा, शोषण जैसी घटनाओं को रोक लगाने के मकसद से लाये गये विधेयक को कांग्रेस समेत विभिन्न सदस्यों ने प्रवर समिति में भेजे जाने की मांग करते हुए इसके कई प्रावधानों को अव्यावहारिक बताया। 

उच्च सदन में उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक में चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा के सुरेश प्रभु ने कहा कि मौजूदा विधेयक में ट्रांसजेंडरों के खिलाफ किसी भी प्रकार के भेदभाव पर रोक लगाने की कोशिश की गई है। इससे रोजगार, स्वास्थ्य देखरेख, शिक्षा इत्यादि जैसे क्षेत्रों में उनके साथ किसी प्रकार के भेदभाव की अनुमति नहीं होगी। 

उन्होंने कहा कि ट्रांसजेन्डर समुदाय के लोगों के खिलाफ मौखिक अपशब्द एवं अवमानना को भी इस कानून के दायरे में लाकर उसपर रोक लगायी जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे विवाद के मामलों के निस्तारण की भी एक समयसीमा तय की जानी चाहिए। 

उन्होंने कहा कि ट्रांसजेन्डर के लिए बनने वाले परिषद में बाकी सदस्यों के अलावा पांच ट्रांसजेन्डर समुदाय के लोग होंगे। उन्होंने परिषद में ट्रांसजेन्डर सदस्यों की संख्या बढ़ाये जाने की भी मांग की। 

आप के संजय सिंह ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि ट्रांसजेन्डर समुदाय के संदर्भ में द्रमुक के तिरुचि शिवा के निजी विधेयक में ट्रांसजेन्डर के लिए नौकरियों में दो प्रतिशत आरक्षण दिये जाने और एक आयोग गठित करने की बात की गई थी लेकिन इन बातों को मौजूदा विधेयक में गायब कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे समुदाय के लोगों के लिए स्व-प्रमाणन की ही व्यवस्था समुचित है।
 
बसपा के अशोक सिद्धार्थ ने इसे देर से उठाया गया स्वागतयोग्य कदम बताते हुए कहा कि ऐसे समुदाय के लोगों के लिए जो परिषद बनाई जा रही है, उस परिषद की साल में कितनी बैठक होगी, परिषद के नियम कानून क्या होंगे, इन सब बातों को स्पष्ट नहीं किया गया है। 

उन्होंने कहा कि करीब 90 प्रतिशत ट्रांसजेन्डर व्यक्ति को उसका परिवार भी स्वीकार नहीं करता। ऐसे में उनके साथ होने वाली गैर-बराबरी को समाप्त करने वाले विधेयक का वह समर्थन करते हैं। 

भाजपा के राकेश सिन्हा ने इस विधेयक को प्रगतिशील हस्तक्षेप बताते हुए कहा कि यह बेहद सुस्पष्ट और समावेशी विधेयक है। उन्होंने कहा कि ट्रांसजेन्डरों की वैश्विक आबादी 1.2 प्रतिशत की है। ऐसे में सरकार द्वारा इस समुदाय के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाने का प्रस्ताव एक सराहनीय कदम है। 

राकांपा की वन्दना चव्हाण ने कहा कि सरकार की ट्रांसजेन्डर की परिभाषा अनुपयुक्त है और यह विधेयक समावेशी नहीं है। उन्होंने कहा कि ट्रांसजेन्डरों को प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए जिला अधिकारी को आवेदन देना होगा यह अपने आप में मानवाधिकारों को उल्लंघन होगा। 

उन्होंने कहा कि ट्रांसजेन्डर के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के लिए दंड के प्रावधान को और सख्त किया जाना चाहिये। 

चर्चा में भाजपा के शिवप्रताप शुक्ला ने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकारों को ऐसे व्यक्तियों को उपयुक्त चिकित्या व्यवस्था को सुलभ बनाने का समुचित इंतजाम करना चाहिये। 

भाकपा के विनय विश्वम ने विधेयक को प्रवर समिति में भेजे जाने की मांग करते हुए कहा कि ट्रांसजेन्डर समुदाय के लोगों के लिए नौकरियों में आरक्षण के साथ साथ संपत्ति में उनके अधिकारों की व्यवस्था की जानी आवश्यक है। 

चर्चा में द्रमुक के पी किशन, बीजद के डा. अमर पटनायक, कांग्रेस के हुसैन दलवई ने भी हिस्सा लिया।