Kabir Das Jayanti 2026: 'बुरा जो देखन मैं चला...' आज कबीर दास जयंती पर पढ़ें उनके वो प्रसिद्ध दोहे, जो बदल देंगे जीवन जीने का नजरिया
आज यानी, 29 जून 2026 को पूरे देश में संत कबीर दास जी की जयंती मनाई जा रही है। उनका जन्म ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को हुआ था, इसलिए हर साल इसी दिन उनकी जयंती (Kabir Das Jayanti 2026) मनाने की परंपरा है। कबीर दास जी भक्ति काल के एक बहुत बड़े संत और कवि थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी समाज की गलत आदतों, अंधविश्वास और धर्म के नाम पर होने वाले झगड़ों का डटकर विरोध किया। उनके दोहे देखने में छोटे होते हैं, लेकिन उनका मतलब बहुत गहरा होता है। आज भी उनके दोहे हमें सही रास्ते पर चलने की सीख देते हैं।
Kabir Das Jayanti 2026: कबीर दास का जीवन

कबीर दास जी का जन्म काशी (वाराणसी) में साल 1398 में हुआ था और उनकी मृत्यु 1518 में मगहर में हुई थी। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की अच्छी बातें सीखीं, लेकिन वे किसी एक धर्म के बंधन में नहीं बंधे। कबीर जी ने सच्ची भक्ति, इंसानियत और सादगी का रास्ता दिखाया। उनका मानना था कि भगवान हर इंसान के अंदर हैं, इसलिए जाति-पाति या मंदिर-मस्जिद के नाम पर लड़ना बेकार है। कबीर दास जी की बातें बहुत सीधी और साफ होती थीं। वे अपने दोहों से बड़ी और गहरी बातों को भी आम लोगों की भाषा में आसानी से समझा देते थे। वे मानते थे कि सुखी रहने के लिए इंसान में सच्चाई, सब्र और संतोष होना जरूरी है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में उनके दोहे हमें रुककर सोचने की प्रेरणा देते हैं।
कबीर दास जी की रचनाओं में मुख्य रूप से राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी और ब्रजभाषा जैसी कई भाषाओं का मेल देखने को मिलता है। वे भगवान राम के बहुत बड़े भक्त थे। उनका कहना था कि हम जिस भगवान को ढूंढने के लिए जगह-जगह भटकते हैं, वे तो हमारे खुद के अंदर ही बसे हैं, बस हम अनजाने में उन्हें देख नहीं पाते। तो चलिए, संत कबीर दास जी के कुछ मशहूर दोहे (Kabir Das ke Dohe) और उनके अर्थ को समझते हैं।
संत कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।।
अर्थ - कबीर दास जी कहते हैं कि अगर हमारे सामने गुरु (शिक्षक) और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों, तो हमें सबसे पहले गुरु के पैर छूने चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि गुरु ने ही हमें शिक्षा देकर भगवान तक पहुंचने का रास्ता बताया है।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
अर्थ- कबीर जी कहते हैं कि जब मैं दुनिया में बुरे लोगों को ढूंढने निकला, तो मुझे कोई भी बुरा नहीं मिला। लेकिन जब मैंने खुद के मन के अंदर झांककर देखा, तो मुझे अहसास हुआ कि मुझसे बुरा और कोई इंसान है ही नहीं। यानी कमी दूसरों में नहीं, हमारे खुद के अंदर होती है।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि मन में धीरज रखना चाहिए, क्योंकि हर काम अपने समय पर ही पूरा होता है। जैसे अगर कोई माली किसी पेड़ में एक साथ सौ घड़े पानी भी डाल दे, तो भी उस पेड़ पर फल तभी आएंगे जब उसका सही मौसम आएगा।
ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोए। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।
अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि हमें हमेशा ऐसी मीठी भाषा बोलनी चाहिए जिससे सुनने वाले को खुशी मिले और हमारा अपना मन भी शांत और खुश रहे।
साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय।।
अर्थ- कबीर दास जी भगवान से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे ईश्वर! मुझे बस इतना ही दीजिए जिससे मेरे परिवार का गुजारा चल सके। न तो मैं खुद भूखा रहूं और न ही मेरे दरवाजे पर आया कोई साधु-संत या मेहमान भूखा लौटे।
गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं। कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं।।
अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि हमें हमेशा अपने गुरु का सम्मान करना चाहिए और उनकी बताई बातों का पालन करना चाहिए। जो शिष्य गुरु की आज्ञा मानता है, उसे तीनों लोकों में किसी भी चीज का डर नहीं रहता।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।
अर्थ- बड़ी-बड़ी किताबें पढ़-पढ़कर दुनिया के बहुत से लोग चले गए, लेकिन कोई भी सच्चा ज्ञानी नहीं बन पाया। इसके उलट, जो इंसान प्यार का सिर्फ ढाई अक्षर अच्छी तरह समझ ले और सबसे प्रेम करे, वही असली ज्ञानी होता है।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥
अर्थ- हमें किसी भी काम को कल के भरोसे नहीं टालना चाहिए। जो काम कल करना है उसे आज ही कर लें, और जो आज करना है उसे अभी कर लें। क्योंकि समय का कोई भरोसा नहीं है, अगर पल भर में कुछ हो गया तो आप अपना काम कब करेंगे?
कुटिल वचन सबते बुरा, जारि करै सब छार। साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार॥
अर्थ- कबीर जी कहते हैं कि कड़वी और बुरी बातें सबसे खराब होती हैं, क्योंकि वे सुनने वाले के दिल को जलाकर राख कर देती हैं। वहीं, सज्जन लोगों की मीठी बातें ठंडे पानी की तरह होती हैं, जो अमृत की तरह सुख और शांति देती हैं। आज के समय में जब चारों तरफ नफरत बढ़ रही है, तब यह दोहा बहुत जरूरी है। कबीर हमें सिखाते हैं कि बोलने से पहले हमेशा सोचना चाहिए कि हमारे शब्द किसी को दुख दे रहे हैं या खुशी।
जिन खोजा तिन पाईयां, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥
अर्थ- जो लोग मेहनत से खोज करते हैं, उन्हें सफलता जरूर मिलती है, ठीक उसी तरह जैसे गहरे पानी में उतरने वाले को मोती मिलता है। लेकिन जो डूबने के डर से किनारे पर ही बैठा रहता है, उसे कुछ हासिल नहीं होता। कबीर कहते हैं कि सच और ज्ञान को पाने के लिए गहराई में जाना पड़ता है। आज हम अक्सर ऊपर-ऊपर की बातें जानकर ही मान लेते हैं कि हम सब जानते हैं, लेकिन कबीर हमें सिखाते हैं कि सच्चे ज्ञान के लिए मेहनत और हिम्मत की जरूरत होती है।
कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और। हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर॥
अर्थ- कबीर जी कहते हैं कि जो लोग गुरु के महत्व को नहीं समझते, वे अंधे के समान हैं। अगर भगवान हमसे नाराज हो जाएं, तो गुरु की शरण में जाकर हम बच सकते हैं, लेकिन अगर गुरु ही नाराज हो जाएं, तो दुनिया में कहीं भी छिपने या सहारा पाने की जगह नहीं बचती।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
अर्थ- कबीर जी समझाते हैं कि जीवन में हर चीज अपने सही समय पर ही होती है। माली चाहे सौ घड़े पानी क्यों न डाल दे, फल तो मौसम आने पर ही लगेगा। आज की तेज जिंदगी में हम हर काम में जल्दबाजी करते हैं, लेकिन यह दोहा हमें धीरज रखने की सीख देता है।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय॥
अर्थ- एक अच्छे और सज्जन इंसान का स्वभाव 'सूप' जैसा होना चाहिए। जैसे सूप अच्छे अनाज को अपने पास रख लेता है और बेकार भूसे को उड़ा देता है, वैसे ही हमें भी अच्छी बातों को अपनाना चाहिए और बेकार व बुरी बातों को छोड़ देना चाहिए।
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु ना भूखा जाय॥
अर्थ- कबीर जी कहते हैं कि हमें भगवान से बस उतनी ही दौलत मांगनी चाहिए जिससे परिवार का पेट भर सके और घर आए किसी मेहमान को भूखा न लौटना पड़े। यह दोहा हमें लालच से दूर रहकर संतोष से जीने की सीख देता है।
तिनका कबहूं ना निन्दिये, जो पांवन तर होय। कबहूं उड़ आंखिन परै, पीर घनेरी होय॥
अर्थ- हमें पैरों के नीचे आने वाले छोटे से तिनके को भी बेकार समझकर उसकी बुराई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अगर कभी वह हवा से उड़कर आंख में चला जाए, तो बहुत तेज दर्द होता है। इसी तरह, हमें किसी भी इंसान को छोटा या कमजोर समझकर उसका मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।
अजहूं तेरा सब मिटै, जो मानै गुरु सीख। जब लग तू घर में रहै, मति कहुं मांगे भीख॥
अर्थ- अगर तुम आज भी अपने गुरु की दी हुई शिक्षा को मान लो, तो तुम्हारा सारा दुख और परेशानी खत्म हो सकती है। जब तक तुम अपने घर-परिवार में हो, तब तक अपनी मेहनत से कमाओ और कभी किसी के सामने हाथ मत फैलाओ।
मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह। ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह॥
अर्थ- मान-सम्मान, बड़प्पन, प्यार और अपनापन- ये सब बहुत कीमती भावनाएं हैं। लेकिन जैसे ही कोई इंसान किसी के सामने कुछ मांगता है, वैसे ही ये सारी चीजें तुरंत खत्म हो जाती हैं।

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