संसद, सांसद और उनके विधेयक!

अक्सर संसद में शुक्रवार के दिन सांसदों द्वारा रखे गये निजी विधेयकों या संकल्पों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है और दुर्भाग्य से इन्हें काफी लम्बे समय तक लटकाये भी रखा जाता है। इस उपेक्षापूर्ण रवैये के लिए सत्तारूढ़ व विपक्ष दोनों ही जिम्मेदार कहे जा सकते हैं परन्तु अन्तिम जिम्मेदारी सरकार पर ही आती है। स्वयं में यह संसदीय व्यवस्था की महत्ता को ही कम करता है क्योंकि एक सांसद के गले में लाखों मतदाताओं की आवाज बसती है। 

भारत की संसदीय प्रणाली का वह दिन वास्तव में इतिहास में दर्ज हो चुका है जिस दिन 1963 में अपना पहला लोकसभा चुनाव जीत कर समाजवादी विचारक व जननेता स्व. डा. राम मनोहर लोहिया ने लोकसभा में प्रवेश किया था। वह उपचुनाव जीत कर आये थे और उनकी जिद्द थी कि वह राज्यसभा के सदस्य नहीं बनेंगे क्योंकि एक जननेता होते हुए वह सीधे आम जनता के वोट से ही संसद में जाना चाहते थे। वह 1963 में लोकसभा में एक निजी विधेयक लाये कि भारत के आम आदमी की औसत आय केवल ‘तीन आना’ रोजाना है जबकि पं. जवाहर लाल नेहरू की तत्कालीन सरकार का योजना आयोग यह आय 12 आना रोज बता रहा था। 

डा. लोहिया ने सीधे नेहरू को चुनौती दी और आंकड़ों से सिद्ध कर दिया कि आमदनी तीन आना रोजाना ही है। इस निजी विधेयक पर इतनी रोचक बहस हुई कि प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने स्वयं इस बहस में भाग लेना उचित समझा और इसके स्वरूप को ही बदल डाला तथा बाद में योजना आयोग पुनर्गठन किया परन्तु राज्यसभा में विगत शुक्रवार को जब तृणमूल कांग्रेस के सदन में नेता श्री डेरेक ओब्रायन अपना निजी विधेयक देश में बुजुर्गों (वरिष्ठ नागरिकों) की देखभाल व सुरक्षा के मुतल्लिक लेकर आये तो सदन में केबिनेट स्तर का कोई मन्त्री ही उपस्थित नहीं था। 

दोनों ही सदनों का कायदा है कि कार्यवाही चलते समय कम से कम एक केबिनेट स्तर का मन्त्री सदन में सरकार की तरफ से अवश्य उपस्थित रहना चाहिए। श्री ओब्रायन बेशक अपेक्षाकृत युवा हैं मगर संसदीय नियमों व कार्यप्रणाली में उन्होंने परिपक्वता बहुत जल्दी हासिल कर ली है। उन्होंने सवाल उठा दिया कि सदन की कार्यवाही कैसे चल सकती है जबकि एक भी कैबिनेट स्तर का मन्त्री मौजूद नहीं है। परिणामतः कार्यवाही दस मिनट के लिए स्थगित हो गई परन्तु असली सवाल विधेयक की महत्ता और उसके प्रारूप का है। 

भारत में आने वाले तीस वर्षों में बुजुर्गों की संख्या में भारी इजाफा होने वाला है और कुल आबादी में इनकी संख्या पचास प्रतिशत के बराबर हो जायेगी जिसे देखते हुए इनकी सुरक्षा का सवाल अत्यन्त गंभीर है। अतः पूर्व केन्द्रीय मन्त्री कुमारी शैलजा द्वारा ‘वरिष्ठ नागरिक आयोग’ गठित करने सम्बन्धी रखा गया निजी विधेयक भी कम महत्व का नहीं है। साथ ही भारत में जो सांस्कृतिक बदलाव हो रहा है और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में बूढ़े माता-पिता व बुजुर्गों को  ‘आऊट हाऊस’ से लेकर वृद्धाश्रमों में भेजने का चलन बढ़ रहा है। 

उसे देखते हुए श्री ओब्रायन का यह विधेयक दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाला है और भारतीय समाज की दिशा तय करने वाला है परन्तु इस विधेयक से अन्य पेश किये गये निजी विधेयकों की महत्ता और प्रासंगिकता कम नहीं होती है। कांग्रेस पार्टी के श्री अभिषेक मनु सिंघवी ने बढ़ती आबादी पर चिन्ता प्रकट करते हुए ‘जनसंख्या नियन्त्रण’ सम्बन्धी कुछ ठोस प्रावधान रखे हैं। वह देश के माने हुए विधिवेत्ता हैं। अतः उनके द्वारा दिये गये सुझाव संवैधानिक पैमाने पर भी खरे होने चाहिए। 

इसी प्रकार समाजवादी पार्टी के श्री जावेद अली खान ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपमान करने और उनके हत्यारे का गुणगान करने पर कम से कम सात साल की सजा का प्रावधान वाला एक संकल्प पेश किया। इस दिन कुल 30 निजी विधेयक रखे गये जिनमें भाजपा के सांसद व पूर्व मन्त्री विजय अग्रवाल का पुरानी दिल्ली के संरक्षण हेतु प्राधिकरण बनाने का विधेयक भी सामाजिक चिन्ताओं को बताता है परन्तु एक ऐसे विधेयक पर भी बहस हुई जो वर्तमान भारत की लोकतान्त्रिक प्रणाली में आधारभूत परिवर्तन का उत्प्रेरक हो सकता है। यह निजी विधेयक कांग्रेस के राज्यसभा सांसद श्री राजीव गौड़ा का है। चुनावों के जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन करने वाले इस विधेयक में लोकसभा व विधानसभा के लिए खड़े होने वाले प्रत्याशियों के खर्च की सीमा को बढ़ाने का संकल्प है। 

हालांकि यह प्रस्ताव इसलिए अनुचित लगता है कि इससे चुनावी खर्च और ज्यादा बढ़ जायेगा मगर प्रस्तावक श्री गौड़ा का तर्क है कि प्रत्याशी गलत खर्च ब्यौरा पेश करते हैं परन्तु असली सवाल यह है कि जो 70 लाख रुपए, लोकसभा के लिए व 28 लाख रुपए विधानसभा के लिए प्रत्याशी खर्च करते हैं क्या वह भारत के एक सजग राजनैतिक कार्यकर्ता के बूते के बस में है। जनता का प्रतिनि​िध बनने का अधिकार क्या केवल उसी व्यक्ति को होगा जिसके पास लाखों रु. चुनाव में खर्च करने के लिए हों, चुनावी खर्च के इस चक्कर ने ही भारत में भ्रष्टाचार की जड़ों को न केवल जमाया है बल्कि इसे संस्थागत रूप दे दिया है। राजनैतिक दलों का चरित्र ही इस व्यवस्था ने बदल कर रख दिया है। राजनीतिक दल धन्ना सेठों से थैलियां लेकर किस प्रकार गरीब व आम मतदाता के हित की बात सोच सकते हैं। 

1974 में यह सवाल स्व. जय प्रकाश नारायण ने अपने ‘सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन’ में उठाया था और चुनावी सुधारों के लिए अवकाश प्राप्त न्यायाधीश वी.एम. तारकुंडे की अध्यक्षता में एक समिति भी बनाई थी जिसने सरकारी खर्चे से चुनाव कराने की वकालत अपनी रिपोर्ट में दी थी मगर जेपी के आशीर्वाद से ही बनी पहली गैर कांग्रेसी मोरारजी देसाई सरकार ने सबसे पहले इसे ही कूड़ेदान में फेंक कर तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एस. एल. शकधर की अध्यक्षता में एक नया ‘चुनाव सुधार आयोग’ बना दिया और मोरारजी सरकार की दो साल की आयु में ही इस आयोग की बात भी आयी गयी हो गई,  इसके बाद चुनाव सुधारों को लेकर कई और समितियां बनी जिसमें सबसे प्रमुख दिनेश गोस्वामी समिति थी जिसकी कुछ सिफारिशों पर सजावटी अमल हुआ। 

असली सवाल चुनाव खर्च का था जिसकी वजह से पूरी चुनाव प्रणाली पर धनपतियों व उद्योगपतियों और अब तो विदेशी कम्पनियों का भी प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है। सितम तो यह हुआ है कि विदेशी कम्पनियों से राजनीतिक चन्दा वसूलने के लिए कम्पनियों की परिभाषा ही बदल दी गई है। यह सितम कांग्रेस व भाजपा दोनों ने ही मिल कर किया है और एक वर्ष पूर्व के बजट के माध्यम से किया है अतः इस विधेयक के निजी स्वरूप को बदलते हुए व्यापक बहस के लिए खुला रखा जाना चाहिए और लोकतन्त्र में आम आदमी की सहभागिता को सीधे बढ़ाया जाना चाहिए।
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