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पुलिसकर्मी हत्यारी भीड़ की तरह काम नहीं कर सकते : मानवाधिकार कार्यकर्ता

पुलिस किसी को भी इस बहाने से नहीं मार सकती। बलात्कारी को स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाना चाहिए, लेकिन न्यायिक प्रणाली का पालन किया जाना चाहिए था।
पुलिसकर्मी हत्यारी भीड़ की तरह काम नहीं कर सकते : मानवाधिकार कार्यकर्ता
महिला पशु चिकित्सक से बलात्कार और उसकी हत्या के चार आरोपियों के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने शुक्रवार को कहा कि पुलिस किसी भी परिस्थिति में पीट-पीटकर हत्या करने वाली भीड़ की तरह व्यवहार नहीं कर सकती। 

कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह मुठभेड़ महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में पुलिस की नाकामी से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए की गई है। अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की सचिव कविता कृष्णन के अनुसार यह न्याय नहीं है, बल्कि पुलिस, न्यायपालिका और सरकारों से जवाबदेही तथा महिलाओं के लिए न्याय और उनकी गरिमा की रक्षा की मांग करने वालों को चुप करने की ‘‘साजिश’’ है। 

कृष्णन ने कहा, ‘‘महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में सरकार की नाकामी के बारे में हमारे सवालों का जवाब देने और अपने काम के लिए जवाबदेह बनने की जगह तेलंगाना के मुख्यमंत्री और उनकी पुलिस ने पीट-पीटकर हत्या करने वाली भीड़ के अगुवाओं की तरह काम किया है।’’ 

उन्होंने कहा कि यह घटना अपराध के खिलाफ पूरी राजनीतिक एवं पुलिस प्रणाली की अयोग्यता और असफलता की स्वीकारोक्ति है। कृष्णन ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव पर ‘‘पूरे मामले’’ से ध्यान भटकाने की कोशिश का आरोप लगाया। 

उन्होंने कहा, ‘‘हम पुलिस और सरकार से कड़े सवाल कर रहे हैं। इन प्रश्नों का उत्तर देने से बचने के लिए यह कार्रवाई यह बताने की कोशिश है कि न्याय दे दिया गया है।’’ कृष्णन ने कहा, ‘‘हमें याद रखना चाहिए कि ये चारों (मारे गए) लोग संदिग्ध थे। हमें नहीं पता कि उनका दोष साबित करने के लिए हिरासत में स्वीकारोक्ति से परे कोई सबूत था या नहीं।’’ उन्होंने कहा कि भारत में पुलिस आम तौर पर यातना के माध्यम से हिरासत में अपराध स्वीकारोक्ति करा लेती है। यातना से सच सामने नहीं आता। 

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मुठभेड़ की घटना सुबह लगभग साढ़े छह बजे उस समय हुई जब 25 वर्षीय महिला पशु चिकित्सक से बलात्कार और उसकी हत्या के चारों आरोपियों को जांच के तहत अपराध के घटनाक्रम की पुनर्रचना के लिए हैदराबाद के निकट अपराध स्थल पर ले जाया गया। 

कृष्णन ने कहा कि इस मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए और उनके खिलाफ अभियोग चलाया जाना चाहिए तथा यह साबित करने के लिए कहा जाना चाहिए कि चारों लोगों को आत्मरक्षा में मारा गया। उन्होंने कहा कि इससे हिरासत में हत्या कर देने की बात प्रतीत होती है, जिसे मुठभेड़ का रूप दिया गया। क्योंकि संदिग्ध पुलिस हिरासत में थे, इसलिए वे निहत्थे थे, यह स्पष्ट है कि पुलिस झूठ बोल रही है। 

‘नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमन’ (एनएफआईडब्ल्यू) महासचिव एनी राजा ने कहा, ‘‘देश में सभी कानून मौजूद होने के बावजूद सरकारें इन्हें लागू करने में नाकाम हो रही हैं। निश्चित ही यह ध्यान भटकाने के लिए किया गया। यह मामले से ध्यान भटकाने की कोशिश है। इस मामले में उच्चस्तरीय जांच की आवश्यकता है।’’ 

वकील एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर ने इस घटना को ‘‘पूरी तरह अस्वीकार्य’’ करार दिया। उन्होंने इस मामले में स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की। ‘अनहद’ (एक्ट नाउ फॉर हारमनी एंड डेमोक्रेसी) की संस्थापक सदस्य शबनम हाशमी ने भी इस बात पर सहमति जताई कि यह लोगों का ध्यान खींचने की सरकार की कोशिश हो सकती है। राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व प्रमुख ललिता कुमारमंगलम ने कहा कि मुठभेड़ बर्बर बलात्कार के खिलाफ व्यापक रोष के चलते अचानक की गई प्रतिक्रिया हो सकती है। 

उन्होंने कहा, ‘‘यह गलत है क्योंकि तब यह भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने वाला न्याय बन जाएगा। न्याय सड़कों पर नहीं होना चाहिए। एक व्यवस्था है जिसे सक्रिय होना चाहिए।’’ भारतीय सामाजिक जागृति संगठन से छवि मेथी ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा, ‘‘पुलिस किसी को भी इस बहाने से नहीं मार सकती। बलात्कारी को स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाना चाहिए, लेकिन न्यायिक प्रणाली का पालन किया जाना चाहिए था।’’ 
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