गैंगरेप पर सियासत

अलवर में पति के सामने महिला से गैंगरेप की घटना दिल्ली में हुए निर्भया कांड जैसी हैवानियत की कहानी है। दरिंदगी की अतिविकृत मानसिकता वाले निर्भया कांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और उससे जन्मी थी सामाजिक क्रांति। इसके बाद देशभर में यौन अपराधों के खिलाफ एक जबर्दस्त माहौल बना था। सरकारों ने भी ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अपनी प्रतिबद्धता बार-बार दोहराई थी। कड़े प्रावधानों के कानून की सलाह देने के लिए जस्टिस वर्मा कमेटी का गठन किया गया जिसकी सिफारिशों के बाद कानून भी बनाया गया लेकिन इसके बावजूद यौन अपराधों में कोई कमी नहीं आई।

यौन अपराधों की शिकार महिलाओं से पुलिस के अमानवीय व्यवहार की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं। मसला सिर्फ दरिंदगी या पुलिस की लापरवाही का नहीं बल्कि चुनाव के दिनों में दरिंदों के कुकर्म पर पर्दा डालने का है। पीड़िता ने पुलिस को दिए अपने बयान में अपने साथ हुई दरिंदगी की जो दास्तान बयां की है, वह राैंगटे खड़े कर देने वाली है। तीन घंटे तक उसके साथ दरिंदगी होती रही, उसे और उसके पति को पीटा गया, उनके कपड़े फाड़ दिए गए। आरोपियों ने उनके पास से पैसे भी छीन लिए और घटना का वीडियो भी बनाया जिसे सोशल मीडिया पर अपलोड नहीं करने के लिए उन्होंने फिरौती भी मांगी। उन्होंने पैसे भी दिए, इसके बावजूद आरोपियों ने घटना का एक वीडियो आैर कुछ आपत्तिजनक तस्वीर व्हाट्सएप ग्रुप पर शेयर कर दी जो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। वह रोती रही, आंसू बहाती रही लेकिन दरिंदों ने उसे तब तक नोचा जब तक उनकी हवस पूरी नहीं हुई।

दरिंदों को न तो कानून का खौफ था और न ही अपने समाज का। यह कैैसी मानसिकता है जो घृणित अपराध का वीडियो बनाती है, फिर उसे वायरल करती है। वीडियो डिलीट करने की बात करने पर जब आरोपियों ने दूसरी बार पैसे मांगे तो दम्पति ने पुलिस से सम्पर्क किया। मामले के तूल पकड़ने पर ही पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है, वहीं मामले में देरी को लेकर राजस्थान पुलिस पर सवाल उठ रहे हैं। पीड़िता का आरोप है कि घटना 26 अप्रैल को हुई और इसकी जानकारी 30 अप्रैल को पुलिस को दे दी गई थी जबकि पुलिस ने 7 मई को एफआईआर दर्ज की। आरोपियों में से एक ने 4 मई को गैंगरेप का वीडियो सोशल मीडिया पर डाला, उस समय भी एफआईआर दर्ज करने में पुलिस ने जो आनाकानी दिखाई उससे पीड़िता खौफ में है। पुलिस वालों ने साफ कहा कि चुनावों की वजह से 5 और 6 मई तक इस मसले पर कुछ नहीं किया जा सकता। पीड़िता दलित है और आरोपी गुर्जर समुदाय से हैं।

गैंगरेप के बाद जयपुर से दिल्ली तक सियासत गर्म हो गई है। राजस्थान में आक्रोश है। भाजपा नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं। पीड़िता को न्याय दिलाने की मुहिम के नाम पर सियासत होने लगी है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सियासत का अखाड़ा गर्म हो चुका है। सवाल यह भी है कि अ​सहिष्णुता के मुद्दे पर अवार्ड वापस लेने वाला गैंग अब खामोश क्यों है? नीतिश कटारा हत्याकांड, प्रियदर्शिनी मट्टू बलात्कार व हत्याकांड, जेसिका लाल हत्याकांड, रुचिका गेहरोत्रा आत्महत्या कांड, आरुषि मर्डर मिस्ट्री और निर्भया रेपकांड, इन सभी में एक बात समानता की है कि इन सभी मामलों में मशहूर सेलिब्रिटीज के नेतृत्व में हुए बहुचर्चित कैंडल मार्च।

राजधानी दिल्ली में इंडिया गेट और मुम्बई में गेटवे ऑफ इंडिया तक मशहूर सेलिब्रिटीज की अगुवाई में इन तमाम मसलों पर न्याय की मांग को लेकर हजारों लोगों ने जलती मोमबत्तियां लेकर मार्च किया। अखबारों में बड़े-बड़े फोटो छपे, जिसमें आक्रोश और एकजुटता का प्रदर्शन हुआ। लोगों का आक्रोश और कैंडल मार्च कितने ही बड़े, सभ्य और नफासत से भरे हों लेकिन इनका देश के राजनीतिक चरित्र पर कोई निर्णायक असर नहीं पड़ा। न तो राजनीतिज्ञों की सोच बदली और न ही पुलिस की कार्यशैली। जरूरत इस बात की है कि यौन अपराधों पर सियासत न हो। अगर हम यौन अपराधों के माध्यम से वोट तलाशते रहे तो क्या होगा? जरूरत है पुलिस को संवेदनशील और जिम्मेदार बनाने की। देश में अगर चुनाव चल रहे हों तो क्या पुलिस अपराधियों को पकड़ना बन्द कर देगी? हमें समूचे लोकतांत्रिक चरित्र को बदलने का काम करना होगा। यह जिम्मेदारी जितनी राजनीतिक दलों की है उतनी ही समाज की भी है। प्रबुद्ध वर्ग को पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए आगे आना होगा।

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