विश्व फिजियोथेरेपी दिवस पर PGIMER के प्रो. विजय जी. गोनी ने बताई फिजियोथेरेपी की अहमियत
विश्व फिजियोथेरेपी दिवस के अवसर पर PGIMER चंडीगढ़ के प्रोफेसर डॉ. विजय जी. गोनी ने फिजियोथेरेपी, रिहैबिलिटेशन और ऑर्थोपेडिक समस्याओं के उपचार को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं। उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में मरीज और उसके परिवार के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि हर दर्द, हर कमर या गर्दन की समस्या और हर मस्कुलोस्केलेटल बीमारी का मतलब सर्जरी नहीं होता। कई परिस्थितियों में सही जांच, उचित चिकित्सकीय सलाह, एक्सरसाइज और विशेषज्ञ की निगरानी में की गई फिजियोथेरेपी से मरीज को काफी राहत मिल सकती है और उसकी कार्यक्षमता में सुधार किया जा सकता है।
डॉ. गोनी ने कहा कि फिजियोथेरेपी को केवल चोट लगने के बाद की जाने वाली प्रक्रिया के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं, चोटों, ऑपरेशन के बाद की रिकवरी तथा कई अन्य परिस्थितियों में मरीज की मूवमेंट, ताकत और रोजमर्रा की गतिविधियों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी रिहैबिलिटेशन को स्वास्थ्य सेवाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। WHO के अनुसार दुनिया में लगभग हर तीन में से एक व्यक्ति ऐसी स्वास्थ्य स्थिति के साथ रह रहा है जिससे रिहैबिलिटेशन से लाभ हो सकता है।
हर कमर दर्द में सर्जरी जरूरी नहीं
कमर दर्द को लेकर डॉ. गोनी ने विशेष रूप से लोगों को जागरूक रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि आज के समय में कमर और गर्दन से संबंधित समस्याएं आम हो गई हैं, लेकिन मरीज को केवल दर्द या MRI रिपोर्ट देखकर घबराने की जरूरत नहीं है। हर MRI में दिखाई देने वाली असामान्यता का अर्थ यह नहीं होता कि तुरंत ऑपरेशन ही एकमात्र रास्ता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी क्रॉनिक प्राइमरी लो-बैक-पेन के लिए नॉन-सर्जिकल उपचारों को लेकर अलग गाइडलाइन जारी की है। वहीं NICE की गाइडलाइन में कमर दर्द और साइटिका के कई मरीजों के लिए सक्रिय रहने, सेल्फ-मैनेजमेंट और उपयुक्त एक्सरसाइज प्रोग्राम को उपचार का हिस्सा माना गया है। स्पाइनल सर्जरी का निर्णय मरीज के लक्षणों, जांच और रेडियोलॉजिकल निष्कर्षों को आपस में मिलाकर किया जाना चाहिए।
डॉ. गोनी के अनुसार, “अगर किसी व्यक्ति को कमर या गर्दन की समस्या है तो सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि समस्या की गंभीरता कितनी है। कुछ विशेष परिस्थितियों में सर्जरी आवश्यक और कभी-कभी आपातकालीन उपचार हो सकती है, लेकिन हर मरीज को सर्जरी की जरूरत नहीं होती।”
उन्होंने समझाया कि यदि गंभीर दर्द के साथ-साथ मरीज में न्यूरोलॉजिकल लक्षण विकसित हो रहे हों, जैसे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर नियंत्रण खोना या नसों से संबंधित गंभीर कमजोरी, तो ऐसी स्थिति को सामान्य दर्द समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
फिजियोथेरेपी को उपचार की पहली सीढ़ी के रूप में समझने की जरूरत
डॉ. गोनी ने कहा कि कई मरीज दर्द शुरू होते ही या MRI रिपोर्ट में कुछ असामान्यता देखकर डर जाते हैं। इसके बाद वे सीधे सर्जरी के बारे में सोचने लगते हैं। उनका कहना था कि उपचार का फैसला केवल रिपोर्ट देखकर नहीं बल्कि मरीज की पूरी क्लिनिकल स्थिति को समझने के बाद होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि फिजियोथेरेपी का उद्देश्य सिर्फ दर्द कम करना नहीं है, बल्कि मरीज की मूवमेंट, मांसपेशियों की ताकत, लचीलापन, संतुलन और दैनिक गतिविधियों को बेहतर बनाना भी है। WHO के अनुसार मस्कुलोस्केलेटल समस्याएं दुनिया भर में विकलांगता का एक बड़ा कारण हैं और इनमें लो-बैक-पेन, गर्दन का दर्द, फ्रैक्चर तथा अन्य हड्डी-मांसपेशियों से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं। इन परिस्थितियों में रिहैबिलिटेशन की महत्वपूर्ण भूमिका है।
फ्रोजन शोल्डर को लेकर भी जागरूकता जरूरी
फ्रोजन शोल्डर के बारे में बात करते हुए डॉ. गोनी ने कहा कि कंधे में दर्द और जकड़न होने पर कई बार मरीज MRI करवाते हैं और रिपोर्ट में किसी प्रकार का टियर या अन्य बदलाव दिखाई देने पर घबरा जाते हैं। इसके बाद मरीज यह मान सकता है कि अब सर्जरी ही एकमात्र विकल्प है।
हालांकि, उन्होंने जोर दिया कि कंधे की हर समस्या का इलाज ऑपरेशन नहीं है। मरीज के लक्षण, शारीरिक जांच, कंधे की मूवमेंट और इमेजिंग को एक साथ देखकर उपचार की योजना बनानी चाहिए। फिजियोथेरेपी और सही एक्सरसाइज कई कंधे की समस्याओं के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। प्रो. विजय गोनी स्वयं फ्रोजन शोल्डर के उपचार से संबंधित एक प्रकाशित क्लिनिकल अध्ययन के सह-लेखक भी रहे हैं।
रोटेटर-कफ से जुड़ी समस्याओं के लिए भी आधुनिक ऑर्थोपेडिक गाइडलाइंस मरीज की स्थिति के आधार पर उपचार तय करने पर जोर देती हैं। AAOS ने 2025 में रोटेटर-कफ इंजरी के प्रबंधन पर evidence-based clinical practice guideline प्रकाशित की है।
“मेडिकल कमर्शियलाइजेशन के दौर में मरीज को दूसरी राय लेने से नहीं डरना चाहिए”
डॉ. गोनी ने स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ते कमर्शियलाइजेशन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मरीज के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज सही निदान और सही उपचार होना चाहिए। उनके अनुसार, कुछ परिस्थितियों में जहां सर्जरी की तत्काल जरूरत नहीं होती, वहां पहले उपलब्ध गैर-सर्जिकल विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी भी मरीज को केवल इसलिए सर्जरी के लिए तैयार नहीं हो जाना चाहिए क्योंकि किसी रिपोर्ट में कोई असामान्यता दिखाई दे रही है। मरीज को अपनी बीमारी, उपलब्ध उपचार विकल्प, सर्जरी की जरूरत, संभावित लाभ और जोखिम के बारे में डॉक्टर से स्पष्ट जानकारी लेनी चाहिए। जरूरत महसूस होने पर दूसरी विशेषज्ञ राय लेना भी उचित हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इसका अर्थ यह नहीं है कि सर्जरी की जरूरत नहीं होती। कई स्थितियों में सर्जरी जीवन बचाने वाली या कार्यक्षमता वापस दिलाने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन सही मरीज में, सही समय पर और सही कारण से सर्जरी होना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अनावश्यक सर्जरी से बचना।
भारत और पश्चिमी देशों की मेडिकल सुविधाओं की तुलना
डॉ. विजय जी. गोनी ने भारत और पश्चिमी देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना करते हुए अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी चिकित्सा व्यवस्था और कामकाज को देखा है।
उनके अनुसार पश्चिमी देशों में कई जगह मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक और कुछ चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता बेहतर हो सकती है, लेकिन वहां मरीजों को विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंचने में कभी-कभी लंबा इंतजार करना पड़ता है।
अमेरिका में डॉक्टरों की उपलब्धता को लेकर प्रकाशित आंकड़े भी इस चुनौती की ओर इशारा करते हैं। AAMC के अनुसार 2024 में अमेरिका में 1,032,365 सक्रिय चिकित्सक थे, लेकिन भविष्य में चिकित्सकों की कमी की आशंका बनी हुई है। AAMC के अनुसार विशेषज्ञ से मिलने के लिए 12 बड़े अमेरिकी महानगरों में औसत प्रतीक्षा समय 31 दिन बताया गया है, जो 2004 की तुलना में 48 प्रतिशत अधिक है।
डॉ. गोनी ने कहा कि भारत की एक बड़ी ताकत यह है कि यहां मरीजों को कई प्रकार की चिकित्सा सेवाएं और जांच अपेक्षाकृत जल्दी उपलब्ध हो सकती हैं। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भारत को अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था में गुणवत्ता, पहुंच, संसाधनों और रिहैबिलिटेशन सेवाओं को और मजबूत करने की दिशा में लगातार काम करना चाहिए।
फिजियोथेरेपी केवल दर्द का इलाज नहीं
उन्होंने कहा कि फिजियोथेरेपी को लेकर समाज में अभी भी कई भ्रांतियां हैं। कुछ लोग इसे केवल मसाज या दर्द कम करने की प्रक्रिया समझते हैं, जबकि आधुनिक फिजियोथेरेपी इससे कहीं व्यापक क्षेत्र है।
इसमें मरीज की समस्या के अनुसार एक्सरसाइज, मूवमेंट ट्रेनिंग, मांसपेशियों की ताकत बढ़ाना, लचीलापन सुधारना, संतुलन बेहतर करना, चोट के बाद पुनर्वास तथा ऑपरेशन के बाद कार्यक्षमता वापस लाने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं।
WHO के अनुसार रिहैबिलिटेशन का मुख्य उद्देश्य बीमारी, चोट या ऑपरेशन के कारण प्रभावित हुई व्यक्ति की कार्यक्षमता को वापस लाना, बनाए रखना या बेहतर करना है। इसमें मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं के अलावा स्ट्रोक, हृदय रोग, सांस संबंधी बीमारियां और कई अन्य स्थितियां भी शामिल हैं।
इस वर्ष World Physiotherapy Day का फोकस भी बेहद महत्वपूर्ण
8 सितंबर को हर वर्ष World Physiotherapy Day मनाया जाता है। World Physiotherapy के अनुसार 2026 में इस दिवस की थीम कार्डियोवैस्कुलर डिजीज और स्ट्रोक की रोकथाम, प्रबंधन और रिहैबिलिटेशन में फिजियोथेरेपी एवं शारीरिक गतिविधि की भूमिका पर केंद्रित है। संगठन के अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि और उचित एक्सरसाइज हृदय स्वास्थ्य तथा स्ट्रोक के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं, जबकि स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन व्यक्ति की शारीरिक कार्यक्षमता, गतिशीलता, संतुलन और जीवन की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
दर्द को नजरअंदाज भी न करें और तुरंत ऑपरेशन से भी न घबराएं- लोगों से अपील
डॉ. गोनी ने लोगों से अपील की कि शरीर में लगातार बने रहने वाले दर्द, कमजोरी, मूवमेंट में कमी या चोट को नजरअंदाज न करें। साथ ही किसी रिपोर्ट में बदलाव दिखाई देने पर बिना विशेषज्ञ की सलाह के यह निष्कर्ष भी न निकालें कि अब सर्जरी ही जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सही निदान, सही विशेषज्ञ की सलाह और जरूरत के अनुसार फिजियोथेरेपी एवं रिहैबिलिटेशन कई मरीजों के उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। वहीं जिन मरीजों में सर्जरी वास्तव में आवश्यक हो, उन्हें समय पर उचित सर्जिकल उपचार मिलना भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने कहा कि मरीज और डॉक्टर के बीच सही संवाद, बीमारी की सही समझ और उपलब्ध सभी उपचार विकल्पों पर चर्चा ही बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था की पहचान है।
विशेषज्ञों का संदेश स्पष्ट है, फिजियोथेरेपी को केवल दर्द के बाद का उपचार न समझें, बल्कि उसे आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में prevention, treatment और rehabilitation की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखें।

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