पुतिन की भारत यात्रा
जब से भारत आजाद हुआ है तब से लेकर आज तक भारत-रूस सम्बन्ध अत्यन्त मधुर, प्रगाढ़ व स्थिर रहे हैं। बेशक 1990 से पहले तक रूस सोवियत संघ था परन्तु इस वर्ष इसका विघटन होने के बाद भारत के सम्बन्ध रूस समेत इसके सभी अन्य देशों से मधुर ही रहे। भारत के सन्दर्भ में रूस की विशेष महत्ता है क्योंकि यह इसका सबसे बड़ा रणनीतिक सहयोगी है। दोनों देशों के सम्बन्ध इतने प्रगाढ़ हैं कि इनकी तुलना किसी अन्य देश के साथ स्थापित दौत्य सम्बन्धों से नहीं की जा सकती है। वैसे भी कूटनीति में द्विपक्षीय सम्बन्धों की तुलना नहीं होती है। परन्तु भारत-रूस के सम्बन्ध इससे बढ़कर आत्मीय कहे जा सकते हैं। यही वजह है कि पिछले 22 साल से दोनों देशों के शीर्षस्थ नेता प्रतिवर्ष एक-दूसरे के देश में आकर इन सम्बन्धों की समीक्षा करते हैं। इन द्विपक्षीय बैठकों में समकालीन वैश्विक परिस्थितियों के सन्दर्भ में आपसी सम्बन्धों की समीक्षा की जाती है। इसी सिलसिले में रूस के राष्ट्रपति श्री व्लादिमिर पुतिन आगामी 4 व 5 दिसम्बर को भारत की दो दिवसीय यात्रा पर आ रहे हैं। उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के बीच मित्रता के और मजबूत होने की उम्मीद है।
रूस के बारे में हर हिन्दुस्तानी जानता है कि यह हर संकट के समय और बुरे वक्तों में भारत के साथ खड़ा नजर आता है। रूस या सोवियत संघ ने हर उस मुद्दे पर भारत का साथ दिया है जिस पर भारत कभी अकेला तक खड़ा नजर आता था। इस बारे में सोवियत नेता स्व. ख्रुश्चेव की पचास के दशक के शुरू के वर्षों में की गई भारत यात्रा बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। श्री ख्रुश्चेव उस समय भारत की लम्बी यात्रा पर आये थे और जम्मू-कश्मीर भी गये थे। उन्होंने श्रीनगर की धरती पर ही खड़े होकर कहा था कि जम्मू-कश्मीर की कोई समस्या नहीं है क्योंकि इसका वैधानिक विलय भारतीय संघ में हो चुका है। इसके बाद का भारत सोवियत संघ या रूस के सम्बन्धों का इतिहास स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य रहा है। चाहे व 1965 का भारत-पाक युद्ध हो या 1971 का बंगलादेश युद्ध , दोनों ही अवसरों पर सोवियत संघ भारत के साथ खड़ा रहा और उसने पाकिस्तान की सरपरस्ती कर रहे अमेरिका को स्पष्ट सन्देश दिया कि वह भारत को कमजोर समझने की गलती कभी न करे। 1971 के युद्ध में जब अमेरिका ने पाकिस्तान की हिमायत में अपना सातवां एटमी जंगी जहाजी बेड़ा बंगाल की खाड़ी उतार दिया था तो सोवियत संघ ने घोषणा कर दी थी कि यदि जहाजी बेड़े से जरा भी हरकत हुई तो परमाणु युद्ध को नहीं टाला जा सकता है। इतना ही नहीं जब अमेरिका ने भारत के खिलाफ उस समय राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में युद्ध रोकने का प्रस्ताव रखा तो सोवियत संघ ने वीटों का इस्तेमाल करके इसे निरस्त कर दिया था।
सोवियत संघ के परोक्ष समर्थन से ही दुनिया के नक्शों पर तब एक नया मुल्क बंगलादेश बना था और पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गये थे तथा पाकिस्तान का सबसे बड़ा हितैषी मुल्क अमेरिका मुंह देखता रह गया था और चीन मूकदर्शक बना हुआ था। यह सब सोवियत संघ ने भारत की दोस्ती में ही किया था। स्वतन्त्रता के बाद भारत के विकास में भी रूस या सोवियत संघ की बहुत बड़ी भूमिका रही है। चाहे वह विज्ञान व टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में प्रगति हो या परमाणु क्षेत्र में विकास का मुद्दा हो, सभी में भारत को इस देश का सहयोग मिलता रहा और रक्षा के क्षेत्र में तो इसका अनूठा योगदान रहा। भारत की रक्षा की अधिसंख्य आधुनिक जरूरतें सोवियत संघ पूरी करता रहा। यह सहयोग थल सेना से लेकर वायु सेना व जल सेना तक की आयुध सामग्री में रहा।
श्री पुतिन प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के निमन्त्रण पर भारत की दो दिवसीय राजकीय यात्रा कर रहे हैं। दोनों देशों के बीच यह वार्षिक आधार पर होने वाली 23वीं बैठक होगी। पिछले वर्ष एेसी ही बैठक के लिए श्री मोदी रूस गये थे और उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने के समझौते किये थे। दोनों नेताओं के बीच इस बैठक में रक्षा सहयोग, शान्तिपूर्ण परमाणु सहकार व ऊर्जा के क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने के नये समझौते भी हो सकते हैं। इसके साथ ही निजी क्षेत्र में भी इन इलाकों में नये सहयोग पर वार्ता हो सकती है। वार्ता के बाद दोनों देशों की तरफ से एक संयुक्त वक्तव्य भी जारी किया जायेगा जिसमें आपसी सहयोग के क्षेत्रों का विशद वर्णन होगा।
भारत और रूस में जिस तरह की विशेष रणनीतिक साझेदारी है उसकी समीक्षा भी इस बैठक में होगी और इस साझेदारी को और प्रगाढ़ करने के रास्ते खोजे जा सकते हैं। बैठक में वैश्विक परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए आपसी सम्बन्धों की समर्थता की समीक्षा भी होगी और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को भी आंकलन में लिया जायेगा। यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि विगत 17 नवम्बर को ही विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर ने रूस की यात्रा की थी और वहां के विदेशमन्त्री से मुलाकात की थी। जबकि इसी दिन श्री पुतिन के निकट व विश्वस्त सहयोगी श्री निकोले पत्रुशेव ने नई दिल्ली में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोभाल से मुलाकात की थी। श्री पत्रुशेव भी रूस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके हैं।