वैकल्पिक राजनीति का राजयोग!

लोकसभा चुनावों के आज सम्पन्न हुए छठे चरण के मतदान के साथ ही देश के 89 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर लिया है। सातवां चरण 19 मई को होगा जिसमें प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी का चुनाव क्षेत्र बनारस भी शामिल है। अभी तक के हुए छह चरणों के चुनावों में जो सबसे बड़ी कमी खटकती रही है वह चुनावी संवाद से ‘आम जनता’ का पूरी तरह गायब रहना है। इससे बहुत बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि क्या भारत के लोगों को ‘राजनैतिक विकल्प’ की जरूरत है अथवा ‘वैकल्पिक राजनीति’ की ? यह सवाल तब और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है जब चुनावी महीना शुरू होने से पहले अकेले मार्च व अप्रैल महीने में जारी चुनावी बांड 3600 करोड़ रुपये के होते हैं और इनका काफी हिस्सा सत्ताधारी पार्टी को जाता है जबकि पिछले 11 महीने में जारी कुल 2300 करोड़ रुपये के बांडों में भी हिस्सेदारी का यही अनुपात रहता है। राजनैतिक वित्तीय पोषण का यह गोपनीय तरीका भारत के लोकतन्त्र से ‘लोक को तन्त्र’ से बाहर फेंकने की चुनौती पेश करता है क्योंकि इसमें सत्ता के साथ वित्तीय सांठगांठ करने की तदबीर भिड़ी हुई है।

जिस मतदाता के एक वोट से लोकतन्त्र में सरकारों का गठन होता है उसे ही जानने का पहला हक संविधान देता है कि वह उन राजनैतिक दलों के आन्तरिक चरित्र के बारे में पूरी तरह बाखबर रहे जिन्हें वह अपना वोट देता है। यदि एेसा न होता तो क्यों यह व्यवस्था की जाती कि राजनैतिक दल आंतरिक स्तर पर लोकतन्त्र कायम रखते हुए इसकी सूचना चुनाव आयोग को देंगे? जाहिर है कि पारदर्शिता के बिना लोकतन्त्र की कल्पना नहीं की जा सकती मगर दुर्भाग्य यह है कि परिस्थितियों में इस तरह बदलाव हो रहा है कि ‘‘स्वायत्तशासी संवैधानिक संस्थाएं भी सम्बद्धता को सामयिक’’ कहने लगी हैं जिसकी वजह से स्वतन्त्र न्यापालिका पर लगातार बोझ बढ़ता जा रहा है परन्तु चुनावी प्रचार में एेसे संवेदनशील मुद्दों का केन्द्र में आना इसलिए संभव नहीं होता क्योंकि राजनीतिज्ञ मतदाताओं की ‘कल्पनाशीलता’ को अपने भावुक हथकंडों से सीमित कर देते हैं जिसका प्रमाण पिछले लगभग 25 सालों से चली आ रही इस देश की राजनीति है।

यही वजह है कि विपक्षी दल भी आज वे नारे लगाने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं जो सत्तर के दशक तक लोकसभा के चुनाव आते ही हवा में तैरने लगते थे और सत्ताधारी दल को उनका जवाब ढूंढने के लिए मजबूर कर देते थे परन्तु 1967 में प्रमुख विपक्षी पार्टी स्वतन्त्र पार्टी के नेता स्व. मीनू मसानी ने घोषणा कर दी थी कि ‘नेहरू का समाजवाद दम तोड़ रहा है।’ मीनू मसानी पारसी थे और गुजरात से लोकसभा चुनाव जीत कर आते थे। उनकी इसी हकीकत में वर्तमान की राजनीति के वैचारिक दिवालियेपन का रहस्य छिपा हुआ है। आज लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए हर नेता को जातिगत व साम्प्रदायिक गुणा-गणित लगाकर चुनाव क्षेत्र तय करना पड़ता है जिसकी वजह से लोकतन्त्र में भारत के आम नागरिक की शिरकत सिकुड़ती जा रही है। इसके बावजूद यदि कोई नेता इस समीकरण को तोड़ने की हिम्मत भी करता है तो उसे इन्हीं समीकरणों में बान्धने के तीर छोड़ दिये जाते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने जब अमेठी के साथ ही केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ने की घोषणा की तो इस चुनाव क्षेत्र को ही पाकिस्तान जैसा इसलिए बता दिया गया कि यहां हिन्दू मतदाताओं की संख्या मुस्लिम व ईसाई मतदाताओं की अपेक्षा थोड़ी कम है।

दूसरी तरफ बेगूसराय से सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार के चुनाव क्षेत्र में मुस्लिम मतदातों की संख्या 28 प्रतिशत होने के साथ ही उनकी जाति भूमिहार में ही दूसरे समजातीय उम्मीदवार होने की वजह से अन्य मुस्लिम उम्मीदवार के पक्ष में उसके धर्म के लोगों का झुकाव दिखाकर राष्ट्रीय मुद्दों को ही काफूर करने का अभियान चला दिया गया। इस सब तथ्यों का आपस में गहरा सम्बन्ध है जो वर्तमान राजनीति के ‘कबायली तेवरों’ को प्रकट करता है जिसकी वजह से पक्ष व विपक्ष आपस में ऐसी कबड्डी खेलते रहते हैं जिसमें जनता की कोई भूमिका ही नहीं रह जाती। विपक्ष भी जनता से जुड़े मुद्दे उठाने में विफल रहा। महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत गांवों में बसता है। गांवों का विकास ही भारत के विकास की गारंटी बनेगा तथा इसमें रहने वाले युवक-युवतियां जब सत्ता के शिखर स्थलों तक पहुंच कर जनता का दुख-दर्द महसूस करते हुए समाधान निकालेंगे तो इस देश को अपने पुराने गौरव को प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकेगा मगर यह क्या हुआ कि पिछले 25 सालों से हम अपने गौरवशाली इतिहास को ही कलुषितापूर्ण बनाते हुए इसके चमकदार वर्कों पर गर्द फेंकने का ही काम कर रहे हैं और भूल रहे हैं कि मुगलिया सल्तनत के दौरान भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा 50 प्रतिशत से भी अधिक था और इस पर कब्जा अधिकांशतः हिन्दुओं का ही था।

1756 तक में बंगाल के पलाशी के युद्ध में जब लार्ड क्लाइव ने नवाब सिराजुद्दौला को छल से परास्त किया था तो विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 25 प्रतिशत था मगर आज उसी बंगाल के हिस्से प. बंगाल मंे हम पुनः हिन्दू-मुसलमान का विमर्श खड़ा कर देना चाहते हैं। यह लोकतन्त्र का विमर्श तो बिल्कुल नहीं हो सकता क्योंकि गांधी बाबा ने डा. अम्बेडकर से जो महान कार्य कराया वह यही था कि प्रत्येक हिन्दू-मुसलमान को बराबर का अधिकार मिले परन्तु भारतीय कभी भी निराश नहीं होते हैं, यह भी उनकी खासियत है। उन्होंने समाजवाद को भी मौका दिया और 2014 में राष्ट्रवाद को भी मौका दिया। 2019 में वह कौन सा प्रयोग करेंगे इस बारे में 23 मई को ही पता चलेगा अतः तब तक हमें हर बंगाली हिन्दू-मुसलमान की तरह ‘वन्दे मातरम्’ और ‘जय हिन्द’ एक साथ ही बोलना चाहिए।

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