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राम का मुकुट ‘भीगा’ नहीं है!

राम का मुकुट ‘भीगा’ नहीं है!
हिन्दी के प्रख्यात महाविद्वान निबन्धकार स्व. डा. विद्या निवास मिश्र ने संभवतः 60 के दशक में अपनी विख्यात पुस्तक ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ लिखी थी जिसमें भारत की ग्रामीण स्थिति से लेकर विविध सामाजिक व राजनैतिक और आर्थिक परिस्थितियों का साहित्यिक चित्रण अति संवेदनशील भवों के साथ किया गया है। डा. विद्यानिवास मिश्र ऐसे महान साहित्यकार थे जिन्होंने मुगलकाल के बादशाह अकबर महान के सिपहसालार अब्दुल रहमान खानेखाना की साहित्य विधा को हिन्दी में प्रतिष्ठापित किया था और उनके लिखे सभी दोहों का संग्रह करके ‘रहीम ग्रन्थावली’ पुस्तक लिखी थी। 

युद्ध के मैदान में अपनी तलवार का कमाल दिखाने वाले रहीम का साहित्य में महारथ इतना प्रभावशाली था कि उन्होंने हिन्दू संस्कृति के वैविध्य का चित्रण अपनी रचनाओं में करके सम्पूर्ण भारतीय समाज की लोकमान्यताओं को धर्म की सीमाओं से ऊपर उठा कर इसकी व्यावहारिकता को प्रतिष्ठापित किया था। इसकी बानगी उनके भगवान राम के सम्बन्ध में लिखे अनेकाधिक दोहों में स्पष्ट झलकती है। उन्हीं में से एक दोहा चित्रकूट की महिमा के बारे में रहीम ने लिखा कि-
‘चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस 
जा पर विपदा परत है तेहि आवत इहि देस’
डा. विद्या निवास मिश्र ने रहीम ग्रन्थावली की रचना करके केवल यह सिद्ध किया था कि भारत की संस्कृति हिन्दू-मुसलमान के भेद से ऊपर है और हिन्दुओं के लोकमान्यता प्राप्त ईष्टदेव मुसलमान नागरिकों के लिए भी श्रद्धा के पात्र रहे हैं। उनका हिन्दुओं का भगवान होने से मुसलमानों में उनके इस देश की  मिट्टी की सुगन्ध में बसे होने से कोई गुरेज नहीं रहा है और उनका व्यावहारिक जीवन ‘राममय’ या किसी  अन्य ‘इष्ट देव’ की भव्यता को लोकजीवन में किसी भी स्तर पर नहीं नकारता है। 

वस्तुतः अपने धर्म का पूरी निष्ठा के साथ पालन करने वाले मुसलमान नागरिक भारत की मिट्टी की सुगन्ध से निकली खुशबू से इस प्रकार अभिभूत रहते हैं कि हिन्दुओं के धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यों में उनकी सहभागिता अनिवार्य बन चुकी है। भारत की इसी विशेषता के दर्शन पूरे उत्तर प्रदेश में आगामी पर्व देव दीपावली के दिन देखने को मिलते हैं जिसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है। गंगा या प्रसिद्ध क्षेत्रीय नदियों के किनारे लगने वाले देव दीपावली के मेलों का इंतजाम मुसलमान नागरिक पूरी निष्ठा और सद्भाव के साथ हिन्दुओं के साथ मिलकर करते हैं। 

अयोध्या का फैसला आने के बाद भारत के प्रत्येक शहर से लेकर गांव में और खासतौर पर उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में जो सद्भाव सर्वत्र देखने को मिला है उसी से साफ हो जाता है कि राम जन्मभूमि के मुद्दे पर आम भारतीय मुसलमान नागरिकों की भावनाएं क्या थीं। वास्तव में मुसलमान नागरिक बाबरी मस्जिद के बारे में उठे ऐतिहासिक विवाद से इस प्रकार से प्रभावित रहे कि उन्होंने हिन्दुओं की मान्यता के समक्ष इस विवाद का शीघ्रातिशीघ्र अन्त ही श्रेयस्कर समझा और यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस स्थान पर राम मन्दिर निर्माण किये जाने के फैसले का उन्होंने स्वागत किया। 

यह स्वागत भारतीय संस्कृति के उस वैभवपूर्ण पक्ष का है जिसमें हर मुगल बादशाह के दरबार में संस्कृत के विद्वान की उपस्थिति आवश्यक होती थी। अतः अयोध्या पर हार-जीत का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है क्योंकि यह लोकजीवन की मान्यताओं की जीत है जिसमें मुसलमान नागरिक भी बराबर की हिस्सेदारी इस तरह करते रहे हैं कि भारत में इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले सूफी सन्तों की दरगाहों पर हिन्दुओं की भीड़ उन्हें अपने भारतीय होने का गौरव प्रदान करती है। यही भारत के मुसलमानों की विशेषता रही है कि उन्होंने हिन्दुओं के ईष्ट देवों के स्थानों की सुरक्षा तक में अपना योगदान देने से हाथ नहीं खींचा है और बदले में हिन्दू भी उनके पवित्र स्थलों को बराबर का सम्मान देते रहे हैं। 

अतः कट्टरपंथी तबके के लोगों को निराशा हो सकती है और वे झुंझलाहट में ऊल-जुलूल बयान दे सकते हैं। मुस्लिम राजनैतिक संगठन इत्तेहादे मुसलमीन के नेता असीदुद्दीन ओवैसी का यह कथन कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ‘भारत के हिन्दू राष्ट्र होने की तरफ बढ़ता कदम है’ महज निराशा और गुस्से में दिया गया ऐसा कथन है जिसमें उनकी राजनीतिक दुकान बन्द होने की आशंका छिपी हुई है। आम मुसलमान उनके इस कथन से किसी भी तौर पर सहमत नहीं हो सकता क्योंकि वह जिस देश में रह रहा है उसकी जड़ों में उसके पुरखों का भी रक्त बहा है और इसके विकास मंे उसका भी बराबर का योगदान रहा है। 

सामाजिक व आर्थिक स्तर पर उसके जीवन का हर हिस्सा हिन्दू मान्यताओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा है और हिन्दुओं की कथित सम्पन्नता का वह आधार इस प्रकार रहा है कि गांव से लेकर गाय और देवालयों तक की प्रतिष्ठा में उसकी व्यावहारिक शिरकत रही है। अतः राम मन्दिर निर्माण के लिए दी गई विवादास्पद जमीन का मालिकाना हक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हिन्दुओं को दिये जाने से उसको किसी प्रकार का कष्ट नहीं हुआ है। 

अतः हिन्दोस्तान की सड़कों पर पहले जैसा शान्ति व सौहार्द का वातावरण कुछ कट्टरपंथी नेताओं को खटक रहा है और वे अपने होश खोकर बेतुकी बातें कर रहे हैं। ओवैसी जैसे नेताओं की सलाह कि हिन्दोस्तानी मुसलमानों को न पहले जरूरत थी और न आज है क्योंकि उन्होंने आजादी के बाद से आज तक अपना सियासी सरपरस्त किसी मुसलमान को नहीं माना और यह जिम्मेदारी भी हिन्दुओं को ही सौंपी। यह हकीकत कट्टरपंथियों की आंखें खोलने के लिए काफी है। 

अतः आज पूरे हिन्दोस्तान की सड़कें बोल रही हैं कि राम के अस्तित्व से भारत का वजूद बन्धा हुआ है और उनके दिखाये गये बुजुर्गों के सम्मान के रास्ते से भला सच्चा ईमान लाने वाले मुसलमान को क्या गुरेज हो सकता है? अतः भारत की दशा देख कर साठ के दशक में डा. विद्या निवास मिश्र ने जब ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ पुस्तक लिखी होगी तो आज की अयोध्या उनका धन्यवाद दिये बिना नहीं रहेगी।
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