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ग्रामीण भारत कोरोना की चपेट में

कोरोना वायरस की पहली लहर से ग्रामीण भारत लगभग अछूता रहा था, कोई एक या दाे केस मिलते थे, वे भी जल्द ठीक हो जाते थे। कोरोना की दूसरी लहर का कहर अब ग्रामीण इलाकों में भी फैलता जा रहा है।
ग्रामीण भारत कोरोना की चपेट में
कोरोना वायरस की पहली लहर से ग्रामीण भारत लगभग अछूता रहा था, कोई एक या दाे केस मिलते थे, वे भी जल्द ठीक हो जाते थे। कोरोना की दूसरी लहर का कहर अब ग्रामीण इलाकों में भी फैलता जा रहा है। शहरों, महानगरों के साथ ही अब गांव-गांव में कोरोना संक्रमण की संख्या तेजी से बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में कोरोना संक्रमण बढ़ने का कारण पंचायत चुनावों को माना जा रहा है। अब तक बाहर से आने वाले या फिर उनके सम्पर्क में रहने वाले ही बीमारी की चपेट में आ रहे थे लेकिन पंचायत चुनावों के बाद ही स्थिति बदतर होनी शुरू हो गई। कई उम्मीदवारों की मौत भी हो चुकी है। अब ग्रामीण इलाकों में कंटेनमैंट जोन बनाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश, ​बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में पहले अन्य राज्यों में काम करने वाले श्रमिकों को पिछले वर्ष लाॅकडाउन के दौरान अपने घरों को लौटना पड़ा था। तब उन्हें गांव पहुंचने पर शिविरों में रहना पड़ा था। पहली लहर के कुछ शांत होते उन्होंने लाॅकडाउन की पाबंदियां खत्म होने पर रोजी-रोटी की तलाश में फिर दूसरे राज्यों की तरफ प्रस्थान करना पड़ा लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के चलते उन्हें फिर गांवों को लौटना पड़ा। इस बार न उनकी जांच हुई और न ही उन्हें अलग रखा गया। प्रवासी मजदूरों के दोबारा पलायन से भी स्थिति खराब हुई हैं। ऐसी स्थितियां देश के ग्रामीण इलाकों में बन रही हैं। ग्रामीण भारत को कोरोना से बचाने की चुनौती बहुत बड़ी है।
सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध डेटा हाउ इंडिया लिव्स के आधार पर 700 जिलों में दर्ज किए गए कोरोना संक्रमण के मामलों पर शोध में पाया गया की कोरोना वायरस ने ग्रामीण इलाकों में तेजी से पांव पसार लिए हैं। इस वर्ष के नौवें सप्ताह में जब कोरोना संक्रमण के मामले आने शुरू हुए थे तब 38 फीसदी नए मामले ऐसे जिलों में दर्ज किए गए थे जहां 60 फीसद से अधिक आबादी गांवों में रहती है। अप्रैल माह खत्म होने तक ये आंकड़ा बढ़कर 48 फीसदी हो चुका है। संक्रमण की गति 35 जिलों में देखी गई जहां 80 फीसद आबादी ग्रामीण इलाकों में है। यहां संक्रमितों का आंकड़ा पहले 9.5 फीसद था, वहीं अब यह आंकड़ा 17 फीसद हो गया है। वहीं दूसरी तरफ ऐसे जिलों में जहां आबादी का 60 फीसद हिस्सा शहरों में रहता है कोरोना संक्रमण में गिरावट आती गई। 
अब समस्या यह है कि शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में हैल्थ सैक्टर का बुनियादी ढांचा तक नहीं है, वहां मरीजों को सम्भालेंगे कैसे। जहां शहरी इलाकों में प्रत्येक दस लाख की आबादी पर सरकारी अस्पताल में 1,190 बिस्तरों की सुविधा है, वहां ग्रामीण इलाकों में प्रत्येक दस लाख की आबादी पर सरकारी अस्पताल में 318 बिस्तरों की ही सुविधा है। राजधानी दिल्ली में संक्रमित मरीजों के लिए बिस्तरों की कमी है, जहां प्रत्येक दस लाख की आबादी पर सरकारी अस्पतालों में 1,452 बेड हैं। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवा की बदहाल हालात इस बात का संकेत हैं कि संक्रमितों की संख्या अधिक होने पर यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था पर तनाव भी कहीं अधिक है। देश में सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में आक्सीजन की कमी के कारण मरीजों के दम तोड़ने की खबरें आ रही हैं। गांंवों में मरीज अब शहरों के अस्पतालों में आएंगे तो इन अस्पतालों पर दबाव पहले से अधिक बढ़ जाएगा। ग्रामीण इलाकों में न तो इंटेसिव केयर यूनिट हैं और न ही डाक्टर। डिस्पैंसरियों की जर्जर दीवारें हाफती नजर आती हैं। इन सबके बीच कोरोना की तीसरी लहर के आने की भविष्यवाणियां वैज्ञानिक कर रहे हैं। भगवान का शुक्र है कि देश में आज की तारीख में इलाज करा रहे मरीजों की संख्या 37.21 लाख जबकि अब तक कुल 2.11 करोड़ संक्रमित हो चुके हैं, जबकि 1.79 करोड़ लोग ठीक हो चुके हैं। यानि की ठीक होने वाले मरीजों की संख्या 50 फीसद से ज्यादा है। यह काफी सकारात्मक है। अब सवाल है कि ग्रामीण इलाकों में वायरस को मात कैसे दी जाए। 
महामारी को मात देने के लिए चित्तौड़गढ़ के एक गांव का गादोला काफी चर्चित हो रहा है। गांव के लोगों ने जितनी लापरवाही बरती, अब उतने ही सजग हैं। समझदारी और जागरूकता से गांव वालों ने कोरोना को मात दे दी। एक समय था जब गांव में 87 पॉजिटिव थे, 25 संदिग्धों की मौत हो चुकी थी। अब केवल एक पॉजिटिव है। तब सरपंच ने बीड़ा उठाया और गांवों वालों का टेस्ट करने के लिए जागरूक किया। छोटी-छटी दुकानें बंद कराई गईं। गांव में लाॅकडाउन लगाया गया। स्पेशल डिस्टेसिंग  का पालन ​किया। लोगों ने खुद को क्वारंटाइन किया। ग्रामीण भारत को कोरोना मुक्त करने का दायित्व प्रशासन के साथ-साथ पंचों-सरपंचों और इलाके के जनपद​निधियों पर है। 
गांवों-गांवों में जागरूकता अभियान, क्वारंटाइन केन्द्र, जांच शिविर लगाए जाने की जरूरत है। राजस्थान के सीकर जिले के गांव सुरनापुरा से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जहां तीन हजार लोग रहते हैं लेकिन एक भी व्यक्ति कोरोना से संक्रमित नहीं हुआ। गांवों के सभी रास्तों पर एंट्री गेट बनाए गए और बाहर से आने वालों की जांच की गई। ऐसा पंजाब के कई गांवों में भी किया गया। कोरोना को मात बचाव के सभी उपायों को अपना कर ही दी जा सकती है। 
हर गांव में बचाव के उपाय मानने होेंगे। मास्क लगाने और सोशल ​डिस्टेंसिंग को आदत बनाना ही होगा।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com
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