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मदरसा या जेहाद की पाठशाला

असम राज्य में जिस तरह दुर्दान्त आतंकवादी संगठन अलकायदा की जेहादी तहरीक के पर्दाफाश यहां के मुख्यमन्त्री श्री हेमन्त विस्वा सरमा ने किया है उससे भारत के सभी राज्यों को चौकन्ना होने की सख्त जरूरत है।
मदरसा या जेहाद की पाठशाला
असम राज्य में जिस तरह दुर्दान्त आतंकवादी संगठन अलकायदा की जेहादी तहरीक के पर्दाफाश यहां के मुख्यमन्त्री श्री हेमन्त विस्वा सरमा ने किया है उससे भारत के सभी राज्यों को चौकन्ना होने की सख्त जरूरत है। असम के विभिन्न निजी मदरसों में वहां पढ़ने वाले छात्रों के जहन में साम्प्रदायिकता का जहर घोल कर उन्हें गैर मुस्लिम जनता के खिलाफ जेहाद करने की तालीम देने की कोशिशें की जा रही हैं वे इस्लामी मुल्क पाकिस्तान में चलने वाले मदरसों की तालीम से भिन्न नहीं हैं। पाकिस्तान में भी मदरसों में पढ़ाने वाले मुल्ला-मौलवी तालिबों को काफिरों के खिलाफ जेहाद करके जन्नत में जाने की तालीम देते हैं। पाकिस्तान जैसा कट्टरपंथी इस्लामी मुल्क भी अपने यहां ऐसे  मदरसों की संख्या बढ़ने से खासा परेशान हो रहा है और इन्हें मिलने वाले चन्दे या खैरात पर किसी तरह पर्दे के पीछे से  पाबन्दी लगाना चाहता है। परन्तु यह तो भारत है जहां संविधान पंथ निरपेक्षता पर आधारित है। लेकिन लगता है कि पंथ निरपेक्षता की आड़ में सबसे ज्यादा लाभ इस्लामी जेहादी तंजीमें उठा रही हैं और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के नाम पर अपने सम्प्रदाय के युवा लोगों को जेहाद के नाम पर आतंकवादी बनाने की तरफ धकेल रही हैं। अफगानिस्तान के तालिबान और कुछ नहीं हैं बल्कि ऐसे ही ‘मदरसों’ से निकले तालिब हैं। श्री सरमा ने साफ किया कि उनके राज्य में जेहादियों ने जाल इस तरह फैलाया है कि इनके पांच फिरके अलग-अलग तरीके से आतंक के इरादों को अमल देने की कार्रवाइयों को तालीम के नाम पर मुस्लिम छात्रों में फैलाना चाहते हैं। इनमें से विगत मार्च महीने में भी बाड़पेटा जिले में एक का पर्दाफाश किया गया था। परन्तु इस बार असम की चौकन्नी पुलिस ने बोरीगांव जिले के मोरवाड़ी कस्बे में एक ऐसे  मदरसे को अपनी गिरफ्त में लिया जिसके संस्थापक मुफ्ती मुस्फा के संबन्ध अलकायदा जैसे संगठन के साथ थे और उसने ही यह मदरसा बिना स्थानीय नगर निकाय की इजाजत के बनाया था और इसमें जेहाद का पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा था। अतः इस मदरसे को बुलडोजर से जमींदोज कर दिया गया है और मुफ्ती मुस्तफा को जेल के भीतर कर दिया गया है। बांग्लादेश के अंसार-उल-इस्लाम जैसे चरम पंथी संगठन का जाल भी इसमें पाया गया है। वस्तुतः स्वयं बांग्लादेश की शेख हसीना की अवामी पार्टी की सरकार भी अपने यहां के इस्लामी जेहादी व चरमपंथी संगठनों से परेशान है और इनकी कार्रवाइयों से परेशान हैं क्योंकि ये संगठन बांग्लादेश में बचे हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर जुल्म ढहाते हैं और उनके साथ मजहब के आधार पर अत्याचार करते हैं। बांग्लादेश की सरकार भारत की परम मित्र हैं और उसके शासन में अल्पसंख्यक हिन्दुओं के साथ एक बराबरी का व्यवहार होता है तथा उनके मजहब का सम्मान करने के आदेश पुलिस व प्रशासन को दिये जाते हैं। इसके बावजूद बांग्लादेश में पाकिस्तान की शह पर कुछ कट्टरपंथी इस्लामी तंजीमे नाम बदल-बदल कर शेख हसीना सरकार के खिलाफ काम करती रहती हैं। इसी से साफ है कि इस्लामी कट्टरपंथी व चरमपंथी तंजीमों की जहनियत क्या है और भारत में भी सक्रिय होकर इनका लक्ष्य क्या हो सकता है। श्री सरमा ने मदरसे पर बुलडोजर चला कर साफ कर दिया है कि भारत में रह कर यहां के प्रेम व भाईचारे के भारतीय आदर्शओं के साथ किसी प्रकार की गलत हरकत बर्दाश्त नहीं जायेगी। असम में मुस्लिम जनसंख्या 30 प्रतिशत के करीब है और यदि इस जनसंख्या की नई पीढ़ी को जेहादी मानसिकता में उतारने के प्रयास किये जाते हैं तो इसके परिणाम भारत की एकता व अखंडता के लिए बहुत गंभीर हो सकते हैं अतः जेहाद की पनाहगाहों को ढहाना ही ‘राजधर्म’ है। लेकिन इससे एक बहुत गंभीर सवाल कड़ा होता है कि भारत के विभिन्न राज्यों खास कर उत्तर प्रदेश व बिहार और मध्य प्रदेश आदि में जो मदरसे हैं उनकी क्या व्यवस्था है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके में विदेशी इमदाद से चलने वाले मदरसों की संख्या कम नहीं हैं और ऐसी ही हाल बिहार में भी है। मदरसों में पढ़ने वाले मुस्लिम छात्रों को पिछली सदियों में रहने की शिक्षा मजहब के नाम पर जिस तरह दी जाती है उससे पूरी पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय होता है और इनसे निकलने वाले छात्र समाज में अपनी संकीर्ण मानसिकता के चलते समय के साथ कदम ताल करने के योग्य नहीं बन पाते। इससे सबसे बड़ा नुकसान उसी सम्प्रदाय का होता है जिससे वे आते हैं। अतः यह बहुत जरूरी है कि देश भर से मदरसे समाप्त करके उन्हें स्कूलों में तब्दील किया जाये जिससे मजहबी शिक्षा के नाम पर छात्राओं को जेहादी बनने से रोका जा सके। मजहब की शिक्षा यदि किसी को देनी है तो उसके लिए सबसे ज्यादा मुफीद जगह उस मजहब की इबादतगाहें या पूजा स्थल या प्रार्थना स्थल हो सकते हैं। संभवतः यही देखते हुए श्री सरमा ने पिछले साल कानून बनाया था कि सरकार जितने भी मदरसों को वित्तीय मदद देती है सभी को स्कूलों में तब्दील कर दिया जायेगा। ऐसे  कानून की जरूरत अब देश के हर राज्य में हैं। सोचने वाली बात यह है कि मजहब का पाठ ही मदरसों में पढ़ाया जाना है तो फिर भारत के पंथनिरपेक्ष रहने का क्या मतलब है? भारत के हर बच्चे को सबसे पहले इंसान बनने की प्रेरणा दी जानी चाहिए और अपने मुल्क के प्रति हर हालत में वफादार रहने की तालीम मजहबी तालीम से ऊपर दी जानी चाहिए जिससे उस मुल्क का विकास हो सके जिसमें उसने जन्म लिया है और जिसकी मिट्टी उसका भरण-पोषण करती है। मजहब के लिए वफादारी उसका निजी मामला है। इसलिए जरूरी है कि सरकार सभी मदरसों को स्कूलों में बदले। गजब का पंथनिरपेक्ष मुल्क है भारत, जहां मजहब के नाम पर ही सबसे अल्पसंख्यक सम्प्रदाय मुस्लिमों को अन्य नागरिकों के मुकाबले विशेषाधिकार दिया गया है कि वे अपने मजहब के कानून के अनुसार अपने घरेलू विरासत के मसले सुलझायें ! देश की 18 प्रतिशत आबादी के लिए अलग कानून होने का मतलब क्या पंथनिरपेक्षता होती है?
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