सियासत से गायब हुआ सेंस ऑफ ह्यूमर

क्या सियासत से सेंस ऑफ ह्यूमर गायब हो चुका है? कहीं कोई हंसी-ठिठोली नजर नहीं आ रही है, केवल अपशब्द और विवादित बयान ही बचे हैं? चारों तरफ कड़वाहट ही कड़वाहट है। यह सवाल लोकसभा चुनावों के अन्तिम चरण के मतदान तक आते-आते काफी बड़े हो चुके हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटने वाले राजनीतिज्ञ ही उसे कुचलने को आमादा हो चुके हैं। ह्यूमर और नेताओं का काफी रिश्ता रहा है। कार्टूनिस्ट हो या व्यंग्यकार और लेखक सबकी पसन्द का चरित्र ‘नेता जी’ ही रहे हैं। बड़े-बड़े लेखकों की कहानियों का केन्द्र बिन्दू नेता ही रहे हैं। आज मीम बनाने वाले, कार्टून बनाने वाले और लेखकों को जेल भेजा जा रहा है। कहने को तो देश में खुलकर बोलने की, गाने की, नाचने की, घूमने की, अपनी पसन्द के कपड़े पहनने, अपनी पसन्द के खाने की आजादी है लेकिन यह कैसी आजादी है कि एक महिला प्रियंका शर्मा को फेसबुक पर ममता बनर्जी का मीम पोस्ट करने पर जेल भेज दिया जाता है।

उसने मेट गाला में शामिल अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की फोटो में उसके चेहरे की जगह ममता बनर्जी का चेहरा लगाकर पोस्ट किया तो उसे 14 दिनों के लिए हिरासत में भेज दिया गया। यह तो गनीमत रही कि सुप्रीम कोर्ट ने उसकी तुरन्त रिहाई के आदेश दिए आैर वह रिहा कर दी गईं। तृणमूल कांग्रेस के नेता विकास हजारा ने प्रियंका शर्मा के खिलाफ पुलिस में शिकायत दी थी और कहा था कि यह मीम न सिर्फ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपमान करता है बल्कि बंगाल की संस्कृति का भी अपमान करता है। ऐसा साइबर क्राइम की श्रेणी में आता है और इसके लिए प्रियंका को सख्त सजा ​मिलनी चाहिए। हैरानी होती है कि तृणमूल नेता की शिकायत पर प्रियंका शर्मा की गिरफ्तारी हुई। अगर ममता बनर्जी का अपमान हुआ तो वह स्वयं शिकायत कर सकती थीं। हैरानी तो इस बात की है कि अभिव्यक्ति की आजादी की वकालत करने वाले नेता आज छोटा सा मजाक भी सहन न कर पा रहे।

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में भी पश्चिम बंगाल सरकार को लताड़ लगाते हुए कहा कि पहली नजर में यह मनमाने तरीके से दर्ज किया गया मामला है। बैंच ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी से समझौता नहीं किया जा सकता लेकिन यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि आपकी वजह से किसी आैर के अधिकारों का हनन न हो। ज्यादा हैरानी की बात तो यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस कई बार आईटी एक्ट की धारा 66-ए के तहत केस दर्ज करती है जबकि सुप्रीम कोर्ट इस धारा को वर्ष 2015 में ही रद्द कर चुका है। इस धारा के तहत पुलिस को यह अधिकार दिया गया था कि वो सोशल मीडिया पर इंटरनेट पर आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। इस धारा के तहत अधिकतम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान था।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताते हुए इसे निरस्त कर दिया था लेकिन पुलिस अब मनमाने तरीके से इस धारा का इस्तेमाल कर रही है। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का मामला काफी चर्चित रहा था। कुछ कार्टूनों की वजह से उन पर देशद्रोह, आईटी एक्ट की धारा 66-ए और राष्ट्रीय प्रतीक अवमानना निरोधक कानून के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी के बाद देशभर में विरोध-प्रदर्शन हुए तो एक माह के भीतर ही उन पर देशद्रोह का केस वापस ले लिया गया। एेसे मामले केवल पश्चिम बंगाल में नहीं हुए बल्कि उत्तर प्रदेश में भी हुए हैं। मुजफ्फरनगर के जाकिर अली त्यागी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर दर्ज मुकद्दमों के बारे में एक फेसबुक पोस्ट लिखी थी। 17 वर्ष के जाकिर को गिरफ्तार कर लिया था। 42 दिन बाद उसे जमानत मिली। जाकिर आज भी केस में उलझे हुए हैं। उत्तर प्रदेश के बहराइच के युवा हारून की कहानी भी जाकिर से मिलती-जुलती है।

इन युवाओं को जेल भेजे जाने के बाद समाज का रवैया उनके प्रति बदल चुका है, जो उनके लिए तकलीफदेह है। दिन में फेसबुक और अन्य सोशल साइटों पर हजारों मीम पोस्ट किए जाते हैं तो क्या पुलिस उन सभी को जेल में डाल देगी? कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि 66-ए को खत्म किए जाने का एक नुक्सान यह हुआ है कि अब ऐसे मामलों में पुलिस अवमानना, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और देशद्रोह कानून के तहत केस दर्ज करने लगी है। मणिपुर में टीवी पत्रकार किशोर चन्द्र की रासुका के तहत गिरफ्तारी की गई थी। क्या देश या राज्य के प्रतिनि​िधयों पर उनकी नीतियों की आलोचना को देशद्रोही माना जा सकता है। कोई समय था पंजाब केसरी में नामी-गिरामी नेताओं के कार्टून प्रकाशित होते थे तब कोई राजनीतिज्ञ मुझे फोन पर न केवल कार्टून की तारीफ करते थे बल्कि कार्टूनिस्ट से मिलने की इच्छा भी व्यक्त करते थे। अपने ही कार्टून को देखकर मजे लेने वालों में अटल जी, लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के दिग्गज नेता शामिल रहे। आज के राजनीतिज्ञ खुद पर बने कार्टूनों, मीम और आलोचना से असहज हो जाते हैं। दरअसल नेता स्वयं को जनता से ऊपर मानने लगे हैं। देश में कानून का दुरुपयोग हो रहा है, ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कौन बचाएगा अभिव्यक्ति की आजादी को?

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