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होली के रंगों में रंगती सामाजिक समरसता

होली पर सामाजिक एकता का अनूठा संगम

07:15 AM Mar 11, 2025 IST | Rahul Kumar

होली पर सामाजिक एकता का अनूठा संगम

भारतीय संस्कृति ने अपनी छाप संसार के सभी देशों मे व्यापक स्तर पर छोड़ी हैं, संस्कृति का मूल तत्व किसी भी देश के नागरिकों को प्रशिक्षित, सजग एवं कला मर्मज्ञ बनाता हैं, ताकि दुनिया के अन्य देशों में अपनी खुशबू को बिखेर पाए । भारतीय समाज का ढांचा इस प्रकार का है की इसमें मानव के पारस्परिक संबंध, लौकिक व्यवहार, कला, दर्शन, उत्सव एंव त्यौहार लोगों को सामाजिक समरसता की ओर ले जाते हैं, जो भारत को एक सहिष्णु राष्ट्र के साथ-साथ समृद्ध और अपूर्व शक्ति शाली बनाता हैं ।

होली, ये त्यौहार देखा जाए तो पूरी तरह कृष्ण को समर्पित हैं जो फाल्गुन महीने मे मनाया जाता है, ये त्यौहार कई दिनों तक चलता हैं जो भारतीयों को प्रेम, मित्रता, आनंद की भावना से भर देता हैं-

उतते आये कुँवर कन्हैया, इतते राधा गोरी रे रसिया । उड़त गुलाल अबीर कुमकुमा, केशर गागर ढोरी रे रसिया । बाजत ताल मृदंग बांसुरी, और नगारे की जोरी रे रसिया । कृष्णजीवन लच्छीराम के प्रभु सौं, फगुवा लियौ भर झोरी रे रसिया । अज्ञात

होली का त्यौहार रंगों का महोत्सव है, जो ऋतु परिवर्तन के साथ पेड़ों पर नए पत्तों के साथ आम जैसे रस भरे फलों के आने की भी सूचना लाता है। कोयल अपनी रसभरी आवाज से प्रेमिकाओं को चिड़ाने लगती हैं, पछुआ हवाओं के झोंकों से गेंहू की बालियाँ किसानों के ह्रदय को प्रफुल्लित कर देती हैं, खेतों में चारों ओर फैली पीली सरसों जैसे चारों दिशाओं को पीला कर देती हैं, फूलों पर मंडराते भँवरे की आवाज नए उत्साह और ऊर्जा का अहसास कराने लगती हैं।

कलांतर मे प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक गाथा को भी जोड़ दिया गया हैं, जब प्रकृति पूजा का महत्व कम हुआ तो पौराणिक प्रभाव बढ़ने लगा, तब दोनों में नामसाम्य के कारण होलिका दहन की गाथा समिश्रण हो गई …किन्तु पौराणिक आवरण के बाद भी इसका आंतरिक रूप बना रहा।

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