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परीक्षा से ज्यादा बच्चों की जीवन रक्षा जरूरी

कोरोना महामारी में पिछले वर्ष डेढ़ लाख स्कूल बंद रहे। भारत में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में नामांकित 24.7 करोड़ बच्चों पर प्रभाव पड़ा।
परीक्षा से ज्यादा बच्चों की जीवन रक्षा जरूरी
कोरोना महामारी में पिछले वर्ष डेढ़ लाख स्कूल बंद रहे। भारत में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में नामांकित 24.7 करोड़ बच्चों पर प्रभाव पड़ा। लाकडाउन के खुलने के बाद कुछ समय पहले ही बड़ी कक्षाओं के लिए स्कूल खुले थे, वे एक बार फिर बंद हो गए हैं। पिछले वर्ष कोरोना के विस्तार के साथ ही मार्च में स्कूलों को बंद कर दिया गया था, अधिकांश स्कूलों  में पूरा शिक्षा सत्र नहीं हो पाया और अनेक स्कूलों, इंजीनियरिंग कालेजों और विश्वविद्यालयों में फाइनल परीक्षाएं नहीं हो पाई थीं। उसके बाद से शिक्षा व्यवस्था पटरी से उतरी हुई है। सबसे बड़ी चुनौती कोरोना काल की यह थी कि दसवीं और 12वीं की परीक्षाएं आयोजित की जाएं तो कैसे?
कोरोना काल की दूसरी लहर ने जब हर गली-गली कहर बरपाना शुरू कर दिया तो सबसे बड़ा सवाल सामने आ खड़ा हुआ। शिक्षा मंत्रालय आैर सीबीएसई बोेर्ड 4 मई से परीक्षाएं करवाने को तैयार था, लेकिन कोरोना के नए केस दो लाख पार पहुंचने के बाद यह जरूरी हो गया था कि इस समय परीक्षा से ज्यादा जरूरी है बच्चों के जीवन की रक्षा। पहली बात तो यह थी कि अभिभावक अपने बच्चों की जान जोखिम में नहीं डालना चाहते थे। छात्र-छात्राएं भी परीक्षाएं स्थगित करने की मांग को लेकर सोशल मीडिया पर अभियान चला रही थीं। लाखों छात्रों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया। राजनीतिज्ञों ने भी बयानबाजी करनी शुरू कर दी थी। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी छात्रों के साथ परीक्षा में चर्चा भी कर चुके थे लेकिन परिस्थितियों ने इतना नाजुक मोड़ ले लिया  कि उनकी और ​िशक्षा मंत्री रमेश चन्द्र निशंक पोखरियाल की मौजूदगी में हुई बैठक में दसवीं कक्षा की परीक्षाएं रद्द करने का फैसला किया, जबकि 12वीं कक्षा की परीक्षाएं फिलहाल टाल दी गई हैं। कई राज्यों ने अपने हाथ पहले ही खड़े कर दिए थे। इस फैसले से राज्य सरकारों को काफी राहत मिली, साथ ही अभिभावकों और शिक्षा ने संकट की इस घड़ी में राहत की सांस ली है। कोरोना का नया वेरिएंट जिस ढंग से 45 वर्ष से कम उम्र के लोगों और छोटी उम्र के बच्चों को भी अपना निशाना बना रहा है, उसे देखते हुए परीक्षाएं रद्द करने या टालने का फैसला वक्त की मांग है।
शायद यह पहला अवसर है कि बच्चे दसवीं की परीक्षाएं दिए बिना 11वीं कक्षा में पहुंच जाएंगे। छात्र और छात्राओं के लिए यह सुखद अनुभव ही होगा। दसवीं के परिणाम सीबीएसई के मानकों के आधार पर तय मापदंडों के अनुरूप आंतरिक मूल्यांकन करके घो​िषत किए जाएंगे। इसमें उन छात्रों को निराशा हो सकती है जो एक-एक नम्बर के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे होंगे। फिलहाल शिक्षा मंत्रालय ने ऐसे छात्रों को विकल्प देने का फैसला किया है जो छात्र पास होने पर मानकों से संतुष्ट नहीं होंगे। यह भी देखना होगा कि मूल्यांकन सही ढंग से हो। यह भी हो सकता है कि प्राइवेट स्कूल इसकी आड़ में अपनी दुकानदारी न शुरू कर दें। कई बार ऐसे देखा गया है कि कुछ निजी स्कूलों ने आठवीं और नौवीं की कक्षाओं के बच्चों को फेल दिखाया फिर अगली कक्षा में प्रमोट करने के नाम पर दुकानदारी चलाई। यद्यपि परीक्षाएं रद्द होना या स्थगित होना छात्रों में शैक्षिक गुणवत्ता के हिसाब से ठीक नहीं लेकिन इस समय क्या किया जाए? सीबीएसई की परीक्षा में करीब 35 लाख से ज्यादा बच्चे बैठने थे, इनमें से 14 लाख से ज्यादा 12वीं के और 22 लाख बच्चे दसवीं के थे। परीक्षाएं मई के महीने में होनी थीं। विशेषज्ञ ने अप्रैल और मध्य मई में महामारी के चरम पर होने का अनुमान व्यक्त किया है। इसलिए परीक्षा केन्द्रों पर होने वाली भीड़ संक्रमण फैलने का बड़ा जरिया बन सकते हैं। स्कूली बच्चों का स्वभाव ऐसा होता है कि वे सोशल डिस्टेसिंग नहीं रख पाते। उन्हें हर हालत में भीड़ से बचाना होगा।
ऐसी स्थिति में सीबीएसई परीक्षाओं को सफलतापूर्वक सम्पन्न करा पाता, इसमें भी संदेह था। फैसला लेने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और शिक्षा मंत्री की अफसरों की बैठक में आनलाइन  परीक्षा और अन्य विकल्पों पर विचार किया गया था लेकिन इस पर अभी बहुत काम करना पड़ेगा।  अब सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि अभिभावक बच्चों को पढ़ाएं तो पढ़ाएं कैसे? बच्चे पहले ही एक साल से घरों में बंद हैं। उनके आचार व्यवहार में भारी परिवर्तन आ गया है। उनके व्यवहार में गुस्सा और चिढ़चिढ़ाहट नजर आने लगी है। कोरोना काल में कक्षाओं का ​विकल्प आनलाइन शिक्षा को मान लिया गया है परन्तु इसकी अपनी समस्याएं हैं। केवल एक चौथाई  घरों तक इंटरनेट की पहुंच है और इसमें ग्रामीण और शहरी के साथ लैंगिक विभाजन भी देखा गया। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में एक बड़े तबके के पास न तो स्मार्ट फोन है, न कम्प्यूटर और न ही इंटरनेट सुविधा है। देश के प्राइवेट और सरकारी स्कूलों की सुविधाएं में भी भारी अंतर है। प्राइवेट स्कूल मोटी फीस वसूल रहे हैं और वे संसाधन ​जुटा लेने में सक्षम हैं लेकिन सरकारी स्कूल तो अभी तक बुनियादी सुविधाओं को जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोरोना वायरस से मुक्ति पाने में अब समय लग सकता है। अब हमें भविष्य की रणनीति तैयार करनी होगी कि शिक्षा के अनुमान की भरपाई कैसे की जाए।
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