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जरा सी आहट होती है...कहीं ये वो तो नहीं

आज एक साल हो रहा है, मुझे लिखने में, बोलने में बहुत कठिनाई महसूस हो रही है कि उनकी पुण्यतिथि है, क्योंकि सोच ही नहीं सकती कि वो नहीं हैं। जरा सी आहट होती है, कानों को आवाज महसूस होती है किरण-तो यही लगता है
जरा सी आहट होती है...कहीं ये वो तो नहीं
आज एक साल हो रहा है, मुझे लिखने में, बोलने में बहुत कठिनाई महसूस हो रही है कि उनकी पुण्यतिथि है, क्योंकि सोच ही नहीं सकती कि वो नहीं हैं। जरा सी आहट होती है, कानों को आवाज महसूस होती है किरण-तो यही लगता है कि कहीं वो तो नहीं, क्योंकि वह आफिस, घर का एक-एक कोना उनका होने का अहसास दिलाता है। कभी वो मुझे बच्चों में दिखाई देते हैं, कभी आफिस कर्मचारियों में, कभी अखबार में। दिल मानने को तैयार नहीं कि वो नहीं हैं। जरा सा कोई बात करता है तो आंसुओं की धाराएं बह निकलती हैं। ऐसे लगता है मेरे अन्दर अश्विनी के नाम का समुद्र भरा है या आंंसुओं के टब भरे हुए हैं। कहीं काेई नाम ले देगा तो आंसुओं  का बांध टूट जाएगा, ​जिसे कोई ताकत, कोई हौंसला, कोई प्यार के शब्द नहीं रोक सकते। मेरी 19वें साल में शादी हुई। (19 साल में पांच साल बचपन के तो छाेड़ ही दो) पर शादी के बाद मैंने अपने जीवन का ज्यादा हिस्सा उनके साथ बिताया।
कुछ लोग बड़ी हैरानगी से कहते हैं कि अरे अश्विनी जी को गए एक साल हो गया पता ही नहीं चला-कोई मुझसे पूछे, मेरे बच्चों से पूछे कि एक-एक सैकेंड, मिनट का क्या हिसाब, क्या नहीं पता चला, कितना दर्द, कितनी कमी है। उनका कमरा, उनका आर्टिकल टेबल, उनकी अलमारियां, उनके जूते-चप्पल वैसे के वैसे हैं, क्योंकि बहुत ही कम जरूरत वाले इंसान थे जो था वाे वैसा का वैसा ही है। लगता है अभी आ जाएंगे। उनकी कोई चीज, सामान अपनी जगह से हिलता था तो उन्हें मालूम पड़ जाता था, सो कोई चीज नहीं हिलायी, कहीं आ जाएं तो उन्हें दुख न लगे। उनके सामान को किसी ने नहीं छेड़ा है। वो हमेशा कहा करते थे किरण तुम्हें सब बहुत प्यार करते हैं, इज्जत देते हैं मुझे नहीं परन्तु जब मैं उनके किसी रिश्तेदार, दोस्त, पत्रकार, क्रिकेट खिलाड़ी, राजनीतिज्ञ से बात करती हूं तो समझ आता है उन्हें बहुत गलतफहमी थी, उन्हें तो सारे दिल की गहराइयों से प्यार करते हैं, करते थे। उन्हें शायद मालूम ही नहीं था या मुझे खुश रखते थे। 
इतना बहुमुखी प्रतिभाशाली व्यक्ति शायद ही कोई होगा, जिसको राजनीति, इतिहास, धर्म, भूगोल, न्यायिक व्यवस्था, ज्योतिष शास्त्र या फिल्मी दुनिया या कोई भी क्षेत्र ले लो का ज्ञान हो।
वो मेरे मित्र थे, गुरु थे, मार्गदर्शक थे। प्यार तो सभी अपनी पत्नियों को करते हैं परन्तु वो मुझे इज्जत-सम्मान देते थे। सही मायने में मेरी पूजा करते थे। हर समय मेरे हर एक्शन की तारीफ करना, मेरे बोलने, मेरे संस्कारों की तारीफ करना, मुझे आगे बढ़ाना उन्हें मेरे सामाजिक कार्यों पर बहुत खुशी महसूस होती थी। मुझे आज भी याद है कि पिछले साल दिसम्बर के महीने में हमारे चौपाल के एक ही दिन में दो प्रोग्राम थे तो सुबह वाले प्रोग्राम में चली गई और शाम वाले प्रोग्राम में नहीं गई तो मुझसे नाराज हुए। यह काम तुम नहीं छोड़ सकतीं। लोग तुम्हारा इंतजार करते हैं। 24 दिसम्बर को अपने पिता के जन्मदिन पर उन्होंने खुद मेरे साथ वरिष्ठ नागरिक के प्रोग्राम में सबका आशीर्वाद लिया और अपने हाथों से सबको सामान बांटा।
आज मैं उनकी पुस्तक को लांच करने जा रही हूं तो उनका एक-एक पन्ना उनकी जिन्दगी की कहानी कह रहा है और सबसे हैरानगी की बात है कि एक साल पहले उन्हें शायद एहसास था, ज्ञान था कि उनके पास समय कम है तो उन्होंने लेखों की शृंखला लिखनी शुरू कर दी-‘It’s my life’ जिसमें उन्होंने जिन्दगी के सारे पन्नों को लिखा, अपने परिवार का इतिहास, अपने दादा, पिता, मां का जुड़ाव और कई पन्ने मेरे ऊपर। यही नहीं अपने क्रिकेट, स्कूल, राजनीतिक, पत्रकार, डाक्टर, वकील, सामाजिक मित्रों के बारे में लिखा। अपने सपने 370, राम मंदिर के बारे में लिखा। अभी उनके कई पन्ने शेष रह गए क्योंकि वह अस्पताल से भी अपने आर्टिकल लिखवा रहे थे। जब वो 12 जनवरी को आईसीयू में गए उनके आक्सीजन मास्क लगा था तो लिख-लिख कर अपनी बातें समझा रहे थे। जब मुझे डाक्टरों की टीम ने कहा कि अब इनके पास समय कम है तो मुझे विश्वास नहीं हो रहा था क्याेंकि डाक्टरों की रिपोर्ट और उनके कृत्य अलग कहानी बता रहे थे। मैं डाक्टर से पूछ रही थी आप कैसे यह कह सकते हो वो तो ठीक हैं, तो डाक्टर वैद्य ने मुझे समझाया कि उनके सभी अंग ठीक हैं, दिमाग, हृदय, लीवर, किडनी परन्तु फेफड़े जवाब दे रहे हैं तो तब भी मुझे विश्वास नहीं था। 14 तारीख को उन्होंने डाक्टर से कह कर मानिटर  जो सारे शरीर के मापदंड देखता है, नाराज होकर अपने सामने करवाए अपने बिस्तर की दिशा बदलवाई तो आप कैसे विश्वास कर सकते थे कि He is going. उनकी मेरे में, मेरे तीनों बेटों में और अखबार में जान बसती थी। मैं उनका पांचवां प्यार थी यानि पहला प्यार देश प्रेम, दूसरा प्यार उनके दादा जी लाला जगत नारायण, तीसरा प्यार उनके पिता, चौथा उनकी मां, पांचवां प्यार मैं आैर छठा प्यार उनके बच्चे।
15 तारीख को भी अपना पूरा अखबार देखा, पढ़ा आैर कहा कि मुझे घर जाना है, अस्पताल में नहीं रहना, इसलिए मुझे लगता है कि वह घर के एक-एक कोने में हैं।
उनकी पुस्तक में उनके ज्ञान, क्रिकेट, राजनीतिक मित्र, बचपन के मित्र, रिश्तेदार सबके बारे में है। यादें भी हैं, शरारत भी है, सच्चाई, निर्भिकता भी है। जब उनकी पुस्तक में उनके लेख पूर्णबद्ध होने जा रहे थे तो उनके मित्र प्रभु चावला के बारे में एक शरारत भरा आर्टिकल हम पढ़ कर मुस्करा रहे थे, साथ ही खड़े उनके ​असिस्टेंट ने कहा मैडम जी यह तो कोई शरारत नहीं जो हमारे साथ वो शरारत करते थे वह आप सोच ही नहीं सकते। कोई उनको शरारत वाला स्टेपलर दे गया, जिसे उठाते ही करंट वाली भावनाएं आती थीं तो इंसान डर सा जाता था। उन्होंने सबसे पहले मुझसे उठवाया फिर एक-एक आफिस के लोगों से फिर वह बच्चों की तरह हंसते थे। जब उनकी पुस्तक कम्पोज हो रही थी तो शायद हम सब रो रहे थे, उनके साथी हरीश, प्रविन्द्र, डिजाइनर उपेन्द्रर उनका असिस्टेंट विजय क्योंकि उनका व्य​क्तित्व ही ऐसा था।
उनके जाने के बाद उनके सभी मित्रों ने चाहे वो किसी भी फील्ड के हैं, हमारा साथ दिया। क्योंकि एक आम महिला की तरह या कह लो एक आम विधवा (अभी मैं अपने आपको विधवा नहीं मानती क्योंकि वो हर पल मेरे साथ हैं) मेरे तीन संस्कारी पुत्र मेरे साथ हैं। मुझे बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जो मैं शायद सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि हमारे जैसे परिवार में भी हो सकता है, परन्तु हमारे परिवार वालों ने अपने परिवार के नाम, संस्कार, नैतिकता की हदें अश्विनी जी के जाने के चौथे दिन से पार कर दीं परन्तु अश्विनी जी मुझे और मेरे बच्चों को विरासत में हौंसला, सच्चाई, निर्भिकता देकर गए हैं। मुझे उम्मीद है मैं सारी चुनौतियों को, उनके व्यक्तित्व को सामने रखकर पार करूंगी। ईश्वर से यही प्रार्थना है मैं, मेरे बच्चे, मेरे आफिस के सारे कर्मचारी उनके दिखाये मार्ग पर चलें  उनके नाम को हमेशा जीवित रखें। ईश्वर पर पूरा भरोसा है और अश्विनी  जी के अक्सर गुनगुनाने वाली पंक्तियों पर भी भरोसा है-
‘‘जीवन-मरण, लाभ-हानि, यश-अपयश सब विधि हाथ।’’
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