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यह भारत की संसद है

भारत के संसदीय लोकतन्त्र में जिस तरह सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार और विपक्ष को संसद के दोनों सदनों में संसदीय कार्यों के मामले में निरपेक्ष भाव से रखा गया है।
यह भारत की संसद है
भारत के संसदीय लोकतन्त्र में जिस तरह सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार और विपक्ष को संसद के दोनों सदनों में संसदीय कार्यों के मामले में निरपेक्ष भाव से रखा गया है और इन दोनों सदनों के सभापतियों की भूमिका को तटस्थता और निष्पक्षता के तराजू पर खरा उतरने के प्रावधान किये गये हैं , उन्हें देखते हुए राज्यसभा में पैदा हुए विवाद का वस्तुगत संवैधानिक विश्लेषण भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र मूल रूप से प्रतिष्ठापित करता है और संसद को सरकार से अलग करते हुए इसकी स्वतन्त्र स्वायत्तता इसके द्वारा ही बनाये गये नियमों के तहत सुनिश्चित करता है।

संसद जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों से मिल कर बनती है जिनके संविधानगत अधिकारों से लैस सदन में अध्यक्ष या सभापति द्वारा दी गई व्यवस्था सर्वोच्च होती है परन्तु यह सम्बन्धित सदन द्वारा नियत किये गये नियमों के दायरे में होनी आवश्यक है।

संसद के उच्च सदन राज्यसभा के सभापति उपराष्ट्रपति होते हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने इस सदन में सभापति पद पर पदेन उपराष्ट्रपति को इसीलिए बैठाया जिससे कनिष्ठ राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति प्रत्यक्ष रूप से संसदीय प्रणाली से जुड़ कर समूची लोकतान्त्रिक  व्यवस्था में संविधान के संरक्षक के रूप में इसकी जवाबदेही सीधे आम जनता के प्रति तय कर सकें।
यह बेवजह नहीं है कि उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद सदस्य करते हैं जिनमें लोकसभा के सदस्यों को सीधे आम जनता चुनती है।

अतः उपराष्ट्रपति जब राज्यसभा में सभापति के रूप मे विराजते हैं तो वह राज्यों की परिषद कही जाने वाली राज्यसभा में सीधे भारत के आम नागरिक को मिले एक वोट के अधिकार की उस संवैधानिक सामर्थ्य की सुरक्षा करते हैं जो उसे इस लोकतन्त्र का मालिक मानता है।

इसीलिए सदन में उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता मगर इसी राज्यसभा में उपसभापति का निर्वाचन स्वयं इसके सदस्य करते हैं। इनके विश्वास और भरोसे पर ही उपसभापति सदन की कार्यवाही चलाते हैं जिसकी प्रथम शर्त निष्पक्षता और सदन द्वारा निर्धारित नियमों के तहत सदन चलाना होता है। अतः सदन के सदस्य यदि उपसभापति में भरोसा खो देते हैं तो उन्हें उनके विरुद्ध उसी प्रकार अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार है जिस प्रकार लोकसभा में अध्यक्ष के खिलाफ, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव भी उस सदन के सदस्य ही करते हैं।

अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए विपक्ष के सांसद स्वतन्त्र होते हैं। इसका उदाहरण स्वतन्त्र भारत की पहली लोकसभा ही है जिसमें कांग्रेस पार्टी को भयंकर बहुमत प्राप्त था। उस समय की लगभग साढे़ चार सौ सदस्यीय लोकसभा में कांग्रेस के चार सौ से कुछ कम सदस्य थे परन्तु पचास से भी कम संख्या में बैठे विपक्षी सदस्य तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष स्व. जी.वी. मावलंकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव उनकी निष्पक्षता पर सन्देह व्यक्त करते हुए लाये थे।

हालांकि 18 दिसम्बर 1954 को रखा गया यह प्रस्ताव भारी बहुमत से गिर गया था परन्तु अध्यक्ष के पद की गरिमा और प्रतिष्ठा को हर सन्देह से परे रखने के कार्य में लोकसभा सफल मानी गई थी।

भारत की संसदीय प्रणाली की संरचना इस प्रकार की गई है कि संसद के दोनों सदनों में ही बहुमत की आवाज के आगे अल्पमत की आवाज कमजोर न लगे, इसी वजह से संसद को सुचारू रूप से चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सत्तारूढ़ दल की तय की गई।

संसद चूंकि राजनैतिक दलों के सदस्यों के समूहों को मिला कर ही बनती है। अतः इसमें सरकार की भूमिका नैपथ्य में चली जाती है। हालांकि सरकार का गठन राजनैतिक दल या गठबन्धन के सदस्यों के बहुमत के आधार पर ही तय होता है मगर सदन के पीठासीन अधिकारी की निगाह में राजनैतिक दल ही रहते हैं।

यही वजह है कि किसी सरकार में शामिल किसी गठबन्धन दल के  मन्त्री बने सदस्य को सदन में अपनी पार्टी की तरफ से बोलने का मौका दिया जाता है। इतनी खूबसूरत कशीदाकारी के साथ तैयार की गई हमारी संसदीय प्रणाली में जब कोई विसंगति पैदा होती है तो भारत की संसद कराहने लगती है और पुकारने लगती है कि इसकी कार्यप्रणाली के आधारभूत सिद्धान्तों का अध्ययन हर राजनैतिक दल के सांसद द्वारा किया जाना चाहिए।

दोनों सदनों के सभापति पदों की तुलना हम प्रायः विक्रमादित्य से करते हैं और अध्यक्ष व सभापति के आसन को विक्रमादित्य का आसन मानते हैं जिस पर बैठने वाला व्यक्ति खुदबखुद ही केवल न्याय के अधीन हो जाता है। संसद में जब कोई विपक्ष में बैठ कर चिल्लाने वाला सांसद अध्यक्ष या सभापति की कुर्सी पर बैठता है तो वहां बैठते ही उसका आचरण इस तरह बदल जाता है कि वह विपक्ष में बैठे शोर मचाते हुए सांसदों को ही नियम बताने लगता है।

हमारी संसदीय प्रणाली की पवित्रता और शुचिता का इससे बड़ा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिल सकता मगर मुख्य बात यह होती है कि सदन चलाने वाली नियम पुस्तिका के अनुरूप ही निर्देश सदस्यों को दिये जाएं। राज्यसभा का संकट मूल रूप से इसी नियम पुस्तिका की अवहेलना करने का है जिसकी वजह से संकट गहराता जा रहा है मगर इसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, पूरा मामला राज्यसभा के उपसभापति के स्वयं के विवेक, धैर्य और वस्तुपरक दृष्टि से जुड़ा हुआ है क्योंकि उनका चुनाव सरकार ने नहीं बल्कि सदन के सदस्यों ने किया है।

संसद इसके सदस्यों के अधिकारों के प्रयोग के आधार पर ही चलती है। ये अधिकार इन्हें संविधान इस प्रकार देता है कि संसद में भारत की आम जनता के उन अधिकारों का बर्चस्व कायम हो जो संविधान ही उसे देता है। इसमें कोई विरोधाभास नहीं है बल्कि यह सत्ता में आम आदमी की भागीदारी तय करने का ज्योमितीय तरीका है। सवाल राज्यसभा से आठ विपक्षी सांसदों को एक सप्ताह के लिए बर्खास्त करने का भी संसदीय नियमों से जाकर जुड़ता है।

ये नियम ही सदन की गरिमा और प्रतिष्ठा के संरक्षक होते हैं। अतः इनका पालन करना प्रत्येक सत्तारूढ़ व विपक्षी सांसद का कर्त्तव्य होता है। नियम यह कहता है कि किसी प्रस्ताव पर सदन में यदि एक सांसद भी मत विभाजन की मांग करता है तो उस पर तुरन्त अमल होना चाहिए। इसका भी सरकार से कोई लेना-देना नहीं होता बल्कि सदन का ही लेना-देना होता है जिसकी जिम्मेदारी अध्यक्ष या सभापति को लेनी होती है। यह बात भी समझी जानी चाहिए कि संसद का ‘रंग’ राजनैतिक होता है मगर इसे चलाने का ‘ढंग’ अराजनैतिक होता है।
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