तूफान की त्रासदी : कैसे मिले शब्द...!

01:52 AM May 23, 2020 | Aditya Chopra
कोरोना वायरस के फैलते दायरे के बीच लगातार भूकम्प  के झटके और अब अम्फान तूफान ने पश्चिम बंगाल और ओडि़शा में भयंकर तबाही मचाई है। मनुष्य फिर सोचने को विवश है कि एक साथ इतनी विपदायें क्यों आ रही हैं। बीते सौ साल के सबसे शक्तिशाली तूफान ने कुछ घण्टों में कोलकाता की तस्वीर बदल दी। कोलकाता के हवाई अड्डे से लेकर सड़कों तक पर भयंकर मंजर देखकर ऐसा लगा कि प्रकृति ने सिटी आफ जॉय को कुचल कर रख दिया है। अब तक आने वाले तूफानों में सुंदरवन के मैग्रोव के जंगल कोलकाता को बचा लेते थे लेकिन अम्फान तूफान के सामने सुंदरवन भी संकट मोचक नहीं बन सका। जानें भी गई और सम्पत्ति भी नष्ट हो गई।
तूफान के दौरान हवाई अड्डे पर खड़े 40 टन वजनी विमान तूफान की चपेट में आकर ऐसे हिल रहे थे जैसे कोई खिलौना हो। अम्फान भयानक होगा इसका अंदाजा तो था लेकिन इतनी तबाही होगी इसकी कल्पना नहीं थी। पूरा महानगर कचरे के ढेर में बदल चुका है। जहां तक ओडि़शा का सवाल है, इस तटीय राज्य का तूफानों से टकराना नियति बन चुका है। मौसम विभाग ने अम्फान चक्रवात पर सटीक अनुमान के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया। तूफान के रास्ते को लेकर चार दिन पूर्व ही सटीक अनुमान लगा लिया गया था। इसके लिए सैटेलाइट से लेकर डाॅप्लर रडार के पूरे तंत्र को इस्तेमाल किया गया। 1999 के बाद भारतीय तट पर पहुंचने वाला यह पहला सुपर साइक्लोन है। अक्तूबर 1999 में ओडि़शा में आए सुपर साइक्लोन ने भारी तबाही मचाई थी और हजारों लोगों की जान ले ली थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि विज्ञान एवं नवीनतम प्रौद्योगिकी को अपना कर मौसम विभाग अब तूफानों का सटीक आकलन प्रस्तुत करने में सक्षम हो चुका है लेकिन प्रकृति के क्रोध का आकलन करना कोई आसान काम नहीं है। परमात्मा की पराप्रकृति के साथ मानव मस्तिष्क अजीब सा खिलवाड़ करता आ रहा है। तूफानों से बचने के लिए तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए मानव ने कितने भी कदम क्यों न उठाये हों लेकिन उसे तूफानों का हलाहल पीना ही पड़ा है।
-प्रकृति की महातुला पर जीवन और मृत्यु के परिप्रेक्ष्य में प्राणी जब भी तोले जाएंगे, वहां मनुष्य के लिए केवल एक ही परिणति होगी -महासंहार।
-समुद्र की अपनी निजता है, उसका जल किस मार्ग से बहे यह प्रकृति प्रदत्त है। मनुष्य सब कुछ भूलकर भौतिकवादियों का अनुसरण कर जीवन का बोध तलाश रहा है।
प्राकृतिक आपदाओं को बांधने में शब्द भी साथ छोड़ देते हैं। इन आपदाओं को नमन करना ही हर हाल में हमारी नियति है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कहा है कि ‘ऐसा भयंकर मंजर कभी पहले नहीं देखा गया। उन्होंने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि वह खुद आकर इस मंजर को देखें।’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 83 दिन बाद अपने आवास से निकल कर पश्चिम बंगाल और ओडि़शा के तूफान प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया। केन्द्र की टीमें भी नुक्सान का ब्यौरा एकत्र कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मांग के अनुरूप एक हजार करोड़ की मदद का ऐलान कर दिया है। पश्चिम बंगाल की समस्या यह है कि वह पहले तूफान से निपटे या कोरोना से। इस मौके पर सम्पूर्ण राष्ट्र का जन-जन एक साथ है और यथासंभव जो भी मानवीय प्रयास हो सकते हैं उनसे न तो केन्द्र सरकार पीछे हटेगी और न ही राज्य सरकार। पश्चिम बंगाल का आम व्यक्ति भी संकट की घड़ी से उबरने के लिए हर संभव योगदान देगा। भारत की भूमि की यह तासीर है कि दुःख और दर्द विषम से विषम स्थिति में भी यहां के लोग बांटते हैं और पूरी शिद्दत के साथ बांटते हैं। मानव जीवन अबूझ है। कभी-कभी तो सारी आयु निकल जाती है और हम इसके रहस्यों को जान ही नहीं पाते। जितने भी विचार​क आए उन्होंने अपन​ी तरह से जीवन को परिभाषित किया है। इसी तरह प्राकृतिक विपदाओं को परिभाषित किया गया है। प्राचीन ग्रंथों में लिखा है कि मनुष्य के स्वभाव को हम प्रकृति ही कहते हैं। मनुष्य जब अपनी प्रकृति से विमुख हो जाता है तब परमात्मा की प्रकृति, जिसे पराप्रकृति कहते हैं, वह भी रुष्ठ हो जाती है। मैं मनुष्य क​ी प्रकृति के बारे में ज्यादा कुछ लिखना नहीं चाहता। यह अपने स्वभाव में है नहीं, इसका निरीक्षण हमें स्वयं करना होगा। अपनी प्रकृति को पराप्रकृति के अनुरूप बनाना होगा।
एक तरफ कोरोना महामारी से लोग मर रहे हैं दूसरी तरफ तूफान से तबाही। वैसे तो विश्व की शक्तियां जो अपनी दादागिरी के बल पर ‘विश्व मित्र’ होने का ढोंग करती रही, महामारी के आगे घुटने टेक रही हैं तो हमें ऐसे लगता है कि न जाने कल क्या होगा। भारत की खासियत यह है कि संकट की घड़ी में भारत अध्यात्म की ओर लौटता है, भावनात्मक एकता मजबूत होती है और भारत फिर उठ खड़ा होता है। अध्यात्म अर्थात मनुष्य, मनुष्य बन जाए बस इतना ही काफी है। अफसोस सियासत महामारी पर ही हो रही है और तूफान पर भी होगी। सभी कुछ हो रहा है, इस तरक्की के जमाने में मगर यह क्या गजब है, आदमी इंसा नहीं होता। भारत के लिए यही बेहतर होगा कि लोग जड़ों की ओर लौटें और इस काल में कराहती मानवता की रक्षा करें, इससे संकट भी खत्म हो जाएगा और जीवन भी पटरी पर लौट आएगा।
  • आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com