उत्तर प्रदेश में वीडियो का खेला

उत्तर प्रदेश की पुलिस ने अपने राज्य के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ के ‘सम्मान’ की रक्षा में जितनी फुर्ती से काम करके तीन पत्रकारों व एक नागरिक को गिरफ्तार करके ‘बेमिसाल’ काम किया है उससे सबसे ज्यादा हैरान खुद ‘कानून’ ही है कि किस सख्तगोई से उसका इस्तेमाल एक ऐसी ‘वीडियो’ के लिए किया गया जिसमें एक महिला मुख्यमन्त्री के साथ अपने सम्बन्धों को लेकर तरह-तरह के दावे कर रही थी। इस वीडियो को अपने हिन्दी न्यूज चैनल पर सवाल भरी टिप्पणियों के साथ दिखाने की हिमाकत करने वाले दो पत्रकारों के साथ ही पुलिस ने उस स्वतन्त्र पत्रकार को भी गिरफ्तार किया जिसने यह वीडियो अपने ट्विटर पर डाल दी थी। 

सोशल मीडिया पर नागरिक अपने विचारों को अपने ढंग से प्रकट करते रहते हैं, इसका अधिकार उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का कानून इस प्रकार देता है कि इसमें किसी व्यक्ति के विरुद्ध वे अपमानजनक व भद्दी टिप्पणियां न की जायें जिनकी इजाजत कानून नहीं देता है परन्तु एक विवादास्पद वीडियो का संज्ञान स्वयं पुलिस ने लेकर जिस ‘स्वामी भक्ति’ का परिचय दिया उससे इसके बेजा इस्तेमाल का ही इजहार हुआ है और मुख्यमन्त्री की प्रतिष्ठा पर चोट पहुंची।
कुछ समय पहले ही लोकसभा चुनावों के दौरान जिस तरह प. बंगाल में भाजपा की एक कार्यकर्ता प्रियंका शर्मा ने इस राज्य की मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी की ‘द्विअर्थी तस्वीर’ अपने ट्विटर पर ही प्रचारित कर दी थी तो उस राज्य की पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार करके अदालत में मुकद्दमा चला दिया था, जिसकी आलोचना तब भाजपा ने ही जमकर की थी। 

मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा था और विद्वान न्यायाधीशों ने प्रियंका शर्मा को जमानत देते हुए कहा था कि उन्हें मुख्यमन्त्री से माफी मांगनी चाहिए लेकिन एक बात और सर्वोच्च अदालत ने कही थी कि यदि वह किसी राजनैतिक दल की सदस्य न होती तो पूरा मामला दूसरे स्तर पर देखा जाता। राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में ममता दी की व्यंग्यपुट से भरी तस्वीर प्रचारित करना अपमान की श्रेणी में रखकर देखा जायेगा। उस समय ममता दी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की तरफ से यही तर्क दिया गया था कि पुलिस ने स्वयं ही इस तस्वीर का संज्ञान लिया था तब भाजपा की ओर से पुलिस पर राजनैतिक हितों को साधने के आरोप लगाये गये थे मगर उत्तर प्रदेश में तो बात इससे भी आगे है क्योंकि पुलिस ने पत्रकारों को ही अपना निशाना बनाया है जिनका मुख्य कार्य सत्ता पर काबिज लोगों से सवाल पूछना ही होता है और किसी भी प्रकार से उठे सन्देहों का निवारण करना होता है।
 
लोकतन्त्र में पत्रकारिता का मूल कार्य यही होता है मगर राज्य की पुलिस स्वामीभक्ति दिखाकर अपने उस फर्ज को दिखावा बना देना चाहती है जो कानून-व्यवस्था से जुड़ा होता है। यदि पुलिस इसी प्रकार सोशल मीडिया में हो रहे हंगामे में ही घुसकर पकड़-धकड़ करने में लगी रहेगी तो असामाजिक तत्वों की मौज आ जायेगी और वे अपना काम आराम से करते रहेंगे। वीडियो का मूल स्रोत जाने बिना ही पत्रकारों की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सीधा हमला ही माना जायेगा और योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा को बजाय बढ़ाने के उल्टे गिरायेगा ही। जिस महिला का वीडियो प्रसारित किया गया उसे उसके घरवाले ही मानसिक रूप से विक्षिप्त बता रहे हैं। 

ऐसी मनः स्थिति की महिला के किये गये दावों को आमजन कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे मगर पुलिस ने तुरत-फुरत जोशीली कार्रवाई करके सन्देहों को निरर्थक ही पुष्टता देने का काम किया है। विभिन्न टीवी चैनलों पर ही आजकल सोशल मीडिया पर प्रसारित विभिन्न वीडियो की पड़ताल करने के कार्यक्रम भी दिखाये जाते हैं और उनकी सत्यता की जांच की जाती है। यह विशुद्ध रूप से पत्रकारिता धर्म का निर्वाह है। न्यूज चैनल जब कोई वीडियो दिखाते हैं तो उसकी सत्यता के बारे में जिम्मेदारी न लेने की चेतावनी भी देते हैं परन्तु समाज में जो घट रहा है उसका चित्रण पेश करना भी पत्रकारिता की जिम्मेदारी होती है अतः पुलिस को सभी पक्षों पर ध्यान देने के बाद कार्रवाई करनी चाहिए थी। 

केवल यह कहकर कि वीडियो ‘आपत्तिजनक सामग्री’ की श्रेणी में आता है, अपमानजनक लक्ष्य की आपूर्ति नहीं करता और इसके लिए न्यूज चैनल के नोएडा दफ्तर को ही सील कर देना पूरी तरह निरंकुशता ही कही जायेगी। वीडियो को न्यूज चैनल के पत्रकारों ने तैयार नहीं किया बल्कि उन्होंने मात्र वह दिखाया जो सोशल मीडिया पर चल रहा था। अपने ट्विटर पर इस वीडियो को डालने वालों का भी कोई दोष नहीं है क्योंकि उन्होंने समाज को सिर्फ वह जानकारी देनी चाही जो उन्हें कहीं से प्राप्त हुई।

इलैक्ट्रानिक माध्यमों पर अपमानजनक सामग्री के प्रसार व प्रचार करने के जुर्म से निपटने के लिए जो तरीका है उसे ‘खुशामदी पुट’ देकर छोटा नहीं किया जा सकता। पुलिस को यह ध्यान रखना चाहिए कि 2015 में ही सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना टैक्नोलोजी का वह कानून 66 (ए) रद्द कर दिया था जिसमें इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की मनमाने ढंग से व्याख्या की गई थी। लोकतन्त्र में आम नागरिक को भी सवाल पूछने का अधिकार है और विभिन्न विषयों पर अपने विचार संवैधानिक दायरे में रखने का हक है। पुलिस यदि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सूक्ष्म तर्कों के पीछे लठ लेकर पड़ जायेगी तो कानून-व्यवस्था को कौन देखेगा? अलीगढ़ में हुई छोटी बच्ची की हत्या को लेकर पूरे प्रदेश में जो हंगामा मचा हुआ है उसकी जड़ में तो पुलिस अभी तक पहुंच नहीं पाई और वीडियो को लेकर बांस पर चढ़ गई। 

पूरे मामले को स्वयं मुख्यमन्त्री को ही इस प्रकार देखना होगा कि उनका सम्मान स्वयं आम जनता ही आगे आकर बचाये न कि पुलिस। योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय नेता माने जाते हैं और उनका व्यक्तिगत जीवन लांछनरहित ही नहीं बल्कि खुली किताब है। उनके सम्मान की रक्षक तो राज्य की जनता स्वयं है, किसी ऊल-जुलूल वीडियो के आने से उनकी अर्जित निजी प्रतिष्ठा धूमिल नहीं हो सकती। उनका बड़े से बड़ा और कट्टर से कट्टर राजनैतिक विरोधी भी उनके चरित्र पर अंगुली उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता।
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