एक्जिट पोल में ‘मतदाता’

स्वतन्त्र भारत में अभी तक हुए सभी चुनावों में 17वीं लोकसभा के लिए सम्पन्न हुए चुनाव इस कारण सबसे अलग माने जायेंगे कि इनमें शुरू से लेकर अन्त तक इन्हें सम्पन्न कराने वाली स्वायत्तशासी संवैधानिक संस्था ‘चुनाव आयोग’ की भूमिका विवादों से भरी रही। इसके साथ ही लोकतन्त्र की चौकीदारी करने वाला स्वतन्त्र मीडिया भी किसी कबूतर की तरह अपने ही स्थान पर बैठे-बैठे पंख फड़फड़ा कर उड़ान भरने का भ्रम पैदा करता रहा (कुछ अपवादों को छोड़कर), बची-खुची कसर स्वयं राजनैतिक दलों ने पूरी कर दी जिन्होंने बजाय ‘राजनैतिक चिट्ठे’ खोलने के ‘व्यक्तिगत चिट्ठे’ खोल डाले मगर इस भयंकर गर्मी में मतदाताओं ने जिस जोश के साथ मतदान किया उससे यही सिद्ध होता है कि लोकतन्त्र की रक्षा करने के लिए इस देश का आम आदमी राजनीति को सही दिशा देने में पीछे नहीं हटता।

चुनाव समाप्त होने के साथ ही एक्जिट पोलों की बाढ़ आनी स्वाभाविक थी, परन्तु इन पर मुझे कभी विश्वास नहीं रहा है क्योंकि इनके आयोजन के पीछे भी राजनीति अपना काम करती है। भारत की जनता का मन जानने के लिए किसी एक्जिट पोल की जरूरत नहीं है बल्कि निष्पक्ष भाव से आम मतदाता के मन में झांकने की जरूरत होती है। यह कार्य कुछ हजार लोगों से सवाल पूछकर नहीं किया जा सकता बल्कि उनके साथ घुल-मिल कर उनके मन में झाकने से ही किया जा सकता है। बेशक कुछ राज्यों के मतदाता अपने मन की बात मुखर होकर बोलते हैं। इनमें प. बंगाल के मतदाता सबसे अलग होते हैं। इसकी वजह उनकी राजनैतिक निडरता और पूरी तरह गैर-लालची स्वभाव होता है। बंगाली का जन्मजात गुण होता है कि वह अपनी संस्कृति के मूल तत्व से कोई समझौता नहीं करता है।

उसके लिए धर्म या मजहब उसका अपना निजी मामला होता है। इसका प्रमाण पिछले वर्ष के अंत में बांग्लादेश के हुए राष्ट्रीय चुनावों में भी मिला था जहां बहुसंख्य जनता मुस्लिम है मगर इन चुनावों के परिप्रेक्ष्य में इसी बांग्लादेश के नोआखाली में महात्मा गांधी का जन्म दिवस 2 अक्टूबर शान से मनाया गया था और नोआखाली तकनीकी विश्वविद्यालय में गांधी दर्शन पर खुलकर चर्चा हुई थी और इसमें भाग लेने वाले भी अधिसंख्य मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी ही थे, जिन्होंने कहा था कि वर्तमान समय में उनके देश के साथ ही समूचे विश्व में गांधी के विचारों की सामयिकता आतंकवाद के फैले विष को समाप्त करने के लिए सबसे ज्यादा है। यह सन्दर्भ इसलिए जरूरी है कि हमारे देश के समाप्त हुए लोकसभा चुनावों में सबसे ज्यादा चर्चा प. बंगाल की ही हो रही है। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि यहां चुनावों में हिंसक घटनाएं हो रही हैं। दरअसल किसी भी थोपे हुए विचार का जोरदार विरोध करना बंगाली स्वभाव है। बंगाली तर्क बुद्धि में बहुत तीक्ष्ण होते हैं।

अतः वे हर बात को पहले तरक्कों पर कसते हैं उसके बाद उसे स्वीकार करते हैं। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी की नेता मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी ने केन्द्र की सत्तारूढ़ भाजपा पार्टी को सीधे निशाने पर इसी वजह से लिया कि लोकसभा चुनावों में भाजपा नेता उनकी सरकार के कार्यकलापों की बात कर रहे थे जबकि उन्हें हिसाब अपने पांच साल की केन्द्र सरकार के कार्यकलापों के बारे में देना था मगर प. बंगाल की जनता का मूड समझने के लिये किसी भी एक्जिट पोल की जरूरत नहीं है क्योंकि इस राज्य के गांव-गांव में मतदाता खुलकर अपनी राजनीतिक वरीयता बिना किसी खाैफ या हिचक के बता रहे हैं। जब 2011 में इस राज्य के विधानसभा चुनाव हुए थे तो गांव-गांव से आवाज आ रही थी कि ‘ए बारी ममता, वामपंथ होवे ना’। इस बार के लोकसभा चुनावों में लोग जिस तरह बोले उसमें साफ है कि हवा का रुख किधर जायेगा। ‘भाजपा की ममता होवे ममता’।

अतः हमें सच्चाई को देखना चाहिए। इस राज्य में भाजपा मुख्यधारा की पार्टी बनने में इसलिए असमर्थ रही है क्योंकि इसकी मान्यताएं बंगाल की संस्कृति के विरुद्ध जानी जाती हैं मगर इसके ठीक विपरीत उत्तर प्रदेश राज्य में स्थिति बिल्कुल उलट है जहां भाजपा मुख्यधारा की पार्टी कांग्रेस को हटाकर बनने में समर्थ रही है हालांकि बसपा व समाजवादी पार्टी ने इसके समक्ष चुनौती फेंक दी है जिसका असर हमें 23 मई को पता चलेगा। बेशक इस राज्य में जातियों का गणित सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करता है और इस तरह करता है कि अनुसूचित जाति व पिछड़े वर्ग के समाज की जातियों में भी ऊंचे दलित और ऊंचे पिछड़े तक हैं।

इस भेदभाव का असर भी राजनीतिक समीकरणों में परिलक्षित हुआ है जिससे उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों का अनुमान बहुत उलझा हुआ बन चुका है, जबकि पंजाब राज्य में चुनाव परिणामों का आकलन अपेक्षाकृत बहुत आसान है बशर्ते यहां के आम लोगों के मन की बात को समझने में गलती न की जाये। इस राज्य के लोग पूरी तरह बाखबर हैं कि चुनाव लोकसभा के हैं अतः बात हो तो भारत सरकार की नीतियों की हो। यही वजह है कि इस राज्य में प्रदेश सरकार का कहीं कोई जिक्र नहीं है और बात राष्ट्रीय मूल मुद्दों पर हो रही है। विविधतापूर्ण भारत की राजनीति को चन्द एक जैसे सवाल सभी राज्यों के लोगों से पूछ कर नहीं समझा जा सकता इसीलिए एक्जिट पोलों को मैं सिवाय ‘समय बिताने के लिए करना है कुछ काम’ मानता हूं।

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