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बिहार में मतदान का ‘जोश’

कोरोना संक्रमण के बावजूद बिहार के मतदाताओं में जिस तरह का उत्साह पहले चरण के मतदान में देखने को मिला उससे भारत में लोकतन्त्र का भविष्य न केवल उज्ज्वल कहा जा सकता है बल्कि पूरी तरह संरक्षित भी कहा जा सकता है।
बिहार में मतदान का ‘जोश’
कोरोना संक्रमण के बावजूद  बिहार के मतदाताओं में जिस तरह का उत्साह पहले चरण के मतदान में देखने को मिला उससे भारत में लोकतन्त्र का भविष्य न केवल उज्ज्वल कहा जा सकता है बल्कि पूरी तरह संरक्षित भी कहा जा सकता है। बिहार के मतदाताओं की जागरूकता बताती है कि वे अपने एक वोट के अधिकार का प्रयोग करने को अपना ईमान समझ कर चलते हैं। बेशक पहले चरण की 70 सीटों पर 54 प्रतिशत से कुछ अधिक ही मतदान हुआ है परन्तु यह 2015 में हुए मतदान के बराबर ही है। इससे सिद्ध होता है कि बिहारी मतदाताओं ने कोरोना के डर से घर में बैठना स्वीकार नहीं किया। कोरोना काल के चलते बिहार में इस बार मतदान के लिए चुनाव आयोग ने पृथक आचार संहिता जारी की थी जिसे देखते हुए मतदान में देरी और कमी होने की संभावनाएं बढ़ गई थीं। जिसे देखते हुए मतदान का समय एक घंटा बढ़ा कर रखा गया था। अगर हम ऐतिहासिक तथ्यों की तरफ नजर दौड़ायें तो 1952 के पहले चुनावों में बिहार का मतदान प्रतिशत 46 के आसपास रहा था। उस समय बिहार में गरीबी की हालत बहुत ही भयंकर थी मगर तब भी लोग पैदल चल कर मतदान केन्द्रों तक पहुंचे थे। अतः बिहार के लोगों में अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करने में शुरू से ही उत्साह रहा है।
 इन 70 सीटों में से बांका सीट ऐसी है जहां 60 प्रतिशत के करीब मतदान हुआ है। बांका बहुत पिछड़ा हुआ इलाका माना जाता है मगर राजनीतिक रूप से यह बहुत ही सजग और अग्रणी रहा है। सत्तर के दशक में उपचुनाव में यहां की लोकसभा सीट से समाजवादी आन्दोलन के प्रमुख स्तम्भ व डा. राममनोहर लोहिया के शिष्य स्व. मधु लिमये जीते थे। श्री लिमये मूलतः मराठी थे और उन्हें कोई भी बिहारी बोली नहीं आती थी। उनके सामने तब कांग्रेस ने ठेठ बिहारी प्रत्याशी को खड़ा किया था मगर श्री लिमये लाखों वोटों से विजयी हो गये थे। यह उद्धरण सिर्फ बिहार की मुफलिस व अनपढ़ कही जाने वाली जनता की राजनीतिक सूझ-बूझ के सन्दर्भ में ही रखा गया है मगर तब से लेकर अब तक बिहार की राजधानी पटना में बहने वाली गंगा में बहुत पानी बह चुका है और आज का बिहार सत्तर के दशक का बिहार बिल्कुल नहीं है क्योंकि इसकी युवा पीढ़ी ने देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक परीक्षा आईएएस व आईपीएस में अपने विशिष्ट स्थान में सफलता प्राप्त की है। इसके साथ ही बिहार की एक और विशेषता रही है कि यह राजनीतिज्ञों का भी समय पड़ने पर मार्गदर्शन करता रहा है।
 कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि राजनीति बिहार के खून में रची बसी है और लोकतन्त्र इसके लोगों की शिरों में दौड़ता है क्योंकि हजारों साल पहले इसके वैशाली के राजतन्त्र में ही लोकतन्त्र की स्थापना की गई थी। वैसे अगर और पीछे प्रागैतिहासिक काल में जाएं तो रामायण के राजा जनक का शासन भी लोकतान्त्रिक तरीके से चलता था जिन्हें भारत का पहला वैरागी व संन्यासी राजा कहा गया और विदेह नाम से पुकारा गया।  ये सभी तथ्य केवल एक बात की ओर इशारा करते हैं कि बिहार में लोकतन्त्र चलता नहीं बल्कि दौड़ता है और अन्य लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है।  54 प्रतिशत मतदान होने का एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि मतदाताओं में उग्रता या व्याकुलता है। इसके राजनीतिक अर्थ सभी प्रतिद्वन्दी दल अपने-अपने हिसाब से निकालेंगे मगर इतना निश्चित है कि चुनाव में आम जनता से जुड़े मुद्दे काम कर रहे हैं।
बिहार के चुनावी माहौल को देख कर कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि इन चुनावों में शिक्षा से लेकर रोजगार व स्वास्थ्य के विषयों पर सभी राजनीतिक दलों का ध्यान है जो कि स्वस्थ लोकतन्त्र की ही निशानी है। इसका दूसरा मतलब भी यह होता है कि चुनाव आम मतदाता के लिए राजनीतिक पाठशाला होते हैं जिसमें विभिन्न विचारधाराओं के दल अपने-अपने नजरिये से जनता के कल्याण की योजनाओं के बारे में अपना पक्ष रखते हैं। जमीनी मुद्दों पर चुनावों में बहस या चर्चा होती है तो अपने एक वोट से सरकार बनाने वाले मतदाता की सोच व्यापक होती है और उसे लगता है कि सत्ता में उसकी भागीदारी तय करने के लिए ही संविधान निर्माताओं ने उसे यह अधिकार दिया था।
 लोकतन्त्र में चुनाव वास्तव में  इसीलिए उत्सव कहलाते हैं कि ये शासन का अधिकार आम आदमी से ही लेते हैं। अतः इस उत्सव में जितने अधिक मतदाता भाग लेंगे उतना ही अधिक इसका आनन्द बढे़गा। इसी वजह से अधिक से अधिक मतदान करने की अपीलें जारी की जाती हैं। लोकतन्त्र की मजबूती के लिए अधिक मतदान का होना इसलिए भी जरूरी होता है क्योंकि इसमें बहुमत का शासन होता है। यह बहुमत धरातल से जब पैदा होगा तो बहुमत की किसी भी सरकार की विश्वसनीयता और पुख्ता बनेगी तथा यह अधिक लोकमूलक होगा। बिहार के चुनाव के अभी और दो चरण बाकी हैं। अतः उम्मीद की जानी चाहिए कि मतदाताओं में इसी प्रकार का जोश-ओ-खरोश बना रहेगा।
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