इस नई सुबह का स्वागत है

अब जबकि जम्मू-कश्मीर व लद्दाख एक नये वजूद के रूप में हमारे सामने आ चुके हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। दरअसल धारा-370 भारत के नक्शे पर और देश की खूबसूरती पर एक ऐसा बदनुमा दाग थी जो जम्मू-कश्मीर पर केन्द्रित था। यह दाग बढ़ते-बढ़ते निश्चित रूप से कैंसर बन चुका था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने देशवासियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए 370 को खत्म कर इसका इलाज कर दिया। अब जम्मू-कश्मीर एक ऐसा राज्य बन गया है जिसकी अपनी विधानसभा होगी और वहां चुनाव हुआ करेंगे। 

लोग इसमें हिस्सा लेंगे तथा अपनी पसंद की सरकार को चुनेंगे जबकि लद्दाख एक दूसरा यूटी होगा, जम्मू-कश्मीर भी यूटी ही होगा लेकिन उसका दर्जा विधानसभा वाला होगा। लोगों को देश के एक राजनीतिक सिस्टम का भी पता लगेगा जो जम्मू-कश्मीर से जुड़ा हुआ था वरना कल तक तो लोग यही समझते थे कि जम्मू-कश्मीर शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद, महबूबा सईद या फिर अब्दुल गली लोन जैसों का प्रदेश है। जम्मू-कश्मीर की केसर से युक्त वादियों में कमल भी खिल सकता है इसका जवाब मोदी सरकार ने बेहतरीन तरीके से दिया है तथा 31 अक्तूबर 2019 की तारीख एक इतिहास बन गयी जब जम्मू-कश्मीर, लद्दाख एक नए वजूद के रूप में हमारे सामने आ गये हैं। 

धारा 370 और 35-ए के माध्यम से मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा पहले ही खत्म कर चुकी है। लद्दाख की अपनी एसेंबली तो नहीं होगी फिर भी वह चंडीगढ़ जैसा होगा और अब दिल्ली की तरह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के दो अलग-अलग उपराज्यपाल बन चुके हैं। खुशी इस बात की है कि इस नए राजनीतिक सिस्टम को आसानी से समझा जा सकता है। यह बात अलग है कि अभी भी इस नए सिस्टम को चलाने और सैट करने में थोड़ा वक्त तो लगेगा इसीलिए विशेषज्ञों ने बयानबाजी शुरू कर दी है। हमारा यह मानना है कि 370 को लेकर कई लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हुए हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर के लोग जानते हैं कि कश्मीरियों के लिए यह पग उठाना जरूरी था। 

आधे से ज्यादा कश्मीर जिन सत्ता के बड़े-बड़े ठेकेदारों की मौजूदगी के चलते खाली हुआ और यह सब आतंकवादियों को शह देकर जिन लोगों ने करवाया उनको जवाब देना भी जरूरी था। सबसे बड़ी बात यह है कि सत्ता के खुद को ठेकेदार समझने वालों की मौजूदगी के बावजूद धारा 370 हटी है। मोदी सरकार के सभी लोग जो इस काम में सूत्रधार रहे हैं उनकी भी प्रशंसा की जानी चाहिए और इस कड़ी में मोदी सरकार की पिछली टर्म में गृहमंत्री रहे श्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री रहीं स्वर्गीय सुषमा स्वराज जी के साथ-साथ मौजूदा एनएसए अजीत डोभाल तथा मौजूदा विदेश मंत्री एस. शिवशंकर के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता।  

जम्मू-कश्मीर के दोनों राज्यपालों की जिम्मेदारी अब और भी बढ़ गई है क्योंकि लोगों के दिलों में आतंक की दहशत खत्म करने के साथ-साथ उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि घाटी में नागरिकों का भविष्य सुरक्षित है। पाबंदियों को लेकर राजनीतिक पार्टियां तरह-तरह का दुष्प्रचार कर रही हैं। केंद्र की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है कि वहां अब देश के अन्य उद्योगपति अपने उद्योग लगाएं इसके लिए जरूरी यह है कि अब कोई आतंक के प्रमोटरों को शह न दे पाए। राजनीतिक इच्छा शक्ति मजबूत होनी चाहिए। कश्मीर और कश्मीरियत के ठेकेदार अब शांत हो रहे कश्मीर और लद्दाख में ड्रामेबाजी न करें। जम्मू अगर मैदान है तो उसे हिंदुओं से न जोड़ें। 

कश्मीर अगर पहाड़ है तो उसे मुसलमानों से न जोड़ें। जम्मू-कश्मीर हो या लद्दाख वहां हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियत रहती है। हिंदुस्तान के रहने वाले लोग किसी सूबे या कस्बे के लोग देश के नागरिक पहले हैं। भारत है तो जम्मू-कश्मीर है। जम्मू-कश्मीर है तो भारतीयता है। यही भारत की सबसे बड़ी पहचान है। ठीक ही कहा है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत और भारतीयता तथा राष्ट्र भावना बसती है। इसी का सम्मान किया जाना चाहिए। यही हमारी भारत माता है। आओ, जम्मू-कश्मीर के रूप में इसके ताज को सुरक्षित रखें।
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