राहुल के बाद कौन?

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद से श्री राहुल गांधी ने अन्ततः अन्तिम रूप से इस्तीफा दे दिया है। जाहिर है इसे लेकर कांग्रेस पार्टी में भारी हड़बड़ाहट और अफरा-तफरी है परन्तु यह भी सत्य है कि कांग्रेस पार्टी का भविष्य किसी एक परिवार से बान्ध कर नहीं रखा जा सकता। बेशक पूर्व में जब भी ऐसा अवसर आया जब कांग्रेस पार्टी को नेहरू-गांधी परिवार और तपे हुए कांग्रेसियों के बीच में से चुनाव करना पड़ा तो पूरा संगठन परिवार के साथ ही गया।

 चाहे वह 1969 का पहला कांग्रेस विघटन हो या 1978 का दूसरा विघटन किन्तु इन दोनों ही विघटन के मूल में  पं. जवाहर लाल नेहरू की पुत्री स्व. इन्दिरा गांधी थीं जिनका राजनैतिक करिश्मा किसी चमत्कार से कम नहीं था और इस कदर था कि 1984 में उनकी हत्या के बाद देश के लोगों ने आंखें बन्द करके राजनीति में कोरे उनके पुत्र स्व. राजीव गांधी को ऐतिहासिक समर्थन दिया था। उस समय कुल 514 लोकसभा सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस को 404 सीटें मिली थीं (पंजाब व असम की कुल 27 सीटों पर 1985 में ही चुनाव हो पाये थे) परन्तु इसके बाद 1989 में हुए चुनाव में कांग्रेस केवल 200 सीटों पर ही निपट गई थी और इसके बाद आज तक यह कभी भी अपने बूते पर बहुमत में नहीं आ पाई। बल्कि डा. मनमोहन सिंह के लगातार पांच साल तक प्रधानमन्त्री रहने के बावजूद 2009 में यह पार्टी इसके बाद सर्वाधिक 209 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी।

 हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष पद पर स्व. राजीव गांधी की पत्नी श्रीमती सोनिया गांधी ही थीं परन्तु 2004 से 2009 तक चली मनमोहन सरकार का असली चेहरा पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी थे जिन्होंने रक्षा और विदेशमन्त्री रहते हुए देश से लेकर विदेशों तक में भारत का झंडा बुलन्दी पर फहराते हुए 2008 में अमेरिका से परमाणु समझौता करके पड़ोसी देश चीन की सारी हेकड़ी झाड़ दी थी और चीन की धरती पर ही बीजिंग में खड़े होकर ऐलान किया था कि ‘आज का भारत 1962 का भारत नहीं है’। 

मेरा निवेदन सिर्फ यह है कि कांग्रेस ने उसी समय परिवार की विरासत की बजाय पार्टी की विरासत पर जीना शुरू कर दिया था बेशक यह कांग्रेस पार्टी के सिद्धान्तों और देश के प्रति निष्ठा का ही फल था कि इसमें प्रणव दा के साथ ही ए.के.एंटोनी से लेकर  पी. चिदम्बरम और कैप्टन अमरेन्द्र सिंह जैसे नेता भी सम्मान पा रहे थे जिनका परिवार के प्रति सम्मान भी कम नहीं था परन्तु उनकी निष्ठा परिवार की जगह जनता के प्रति ज्यादा रही। इन सब लोगों ने राजनीति के दांव-पेंचों से बेखबर डा. मनमोहन सिंह का नेतृत्व कांग्रेस पार्टी की मजबूती के लिए ही स्वीकार किया। जाहिर है कि कांग्रेस को चाटुकारिता संस्कृति से बाहर लाने की इनमें इच्छा शक्ति इस वजह से जागृत नहीं हो सकी क्योंकि  इन सभी का उद्भव उस इन्दिरा युग में हुआ था जिसमें इदिरा गांधी के नाम का मतलब ही कांग्रेस होता था।

 इन्दिरा जी ने 1969 में हुए पहले कांग्रेस विघटन के बाद ही इस पार्टी की संस्कृति पूरी तरह बदलकर रख दी थी और राज्यों के मुख्यमन्त्रियों को वह इस प्रकार बदलती थीं जैसे किसी दफ्तर में पानी पिलाने वाले कर्मचारी को बदला जाता है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वह तदर्थ आधार पर नियुक्त करती थीं। उनके न रहने पर इसका सबसे बड़ा नुक्सान कांग्रेस संगठन को ही हुआ और कालान्तर में यह पार्टी सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार का जयकारा लगाने वाले चाटुकारों के नियन्त्रण में आती चली गई जिससे समझौता करना हर सुविज्ञ और प्रखर कांग्रेसी के लिए शर्त बन गया। हद तो तब हो गई जब 2012 के करीब पहुंचते-पहुंचते कांग्रेसी युवा नेता राहुल गांधी को डा. मनमोहन सिंह की जगह प्रधानमन्त्री बनाने की मांग करने लगे। 

कांग्रेस के अधिवेशनों में ही डा. मनमोहन सिंह की मौजूदगी में ही ये नारे लगने लगे। एेसा माहौल लोकतन्त्र में किसी भी व्यक्ति में राजसी भाव पैदा कर सकता है। अतः श्री राहुल गांधी की इतनी गलती नहीं है जितनी कि कांग्रेसियों की है। इसका मतलब यही निकाला जा सकता है कि आज की कांग्रेस पार्टी पूरी तरह आत्मविश्वास खो चुकी है और उसे देश की जनता से ज्यादा एक परिवार पर भरोसा है। हकीकत यह है कि पिछले साल राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रभावशाली प्रदर्शन करके श्री राहुल गांधी ने कांग्रेसियों में विश्वास पैदा किया कि वे परिवार की जय-जय करने की बजाय यदि जनता की जय-जयकार करें तो उनकी नैया पार हो सकती है। 

मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ के मुख्यमन्त्रियों का चुनाव करते समय भी उन्होंने राजनैतिक परिपक्वता का प्रदर्शन किया परन्तु लोकसभा चुनावों में उनका खड़ा किया विमर्श जनता के गले नहीं उतर सका और वह पहला गच्चा तब खा गये जब उन्होंने राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कमजोरी दिखाई और श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गरीबों के लिए खड़े किये विमर्श को ही लम्बी लकीर खींच कर छोटा करना चाहा। इसके कई और भी कारण हैं परन्तु सबसे बड़ा कारण कांग्रेस की परिवारवाद की चाटुकार संस्कृति ही है जिसने राहुल गांधी को जमीन पर उड़ रही मिट्टी की सुगन्ध को नहीं सूंघने दिया।

 इसके पीछे स्वयं उनका व्यवहार भी एक कारण हो सकता है परन्तु मुख्य मुद्दा यह है कि अब किसी लुटे नवाब की तरह अपने बंगले के टूटे-फूटे फर्नीचर को निहारती कांग्रेस का क्या हो? याद कीजिये 1962 के चुनावों के बाद पं. नेहरू के समक्ष भी यह चिन्ता खड़ी हो गई थी कि पार्टी की खराब होती साख को सुधारने के लिए क्या जाये? तब उन्होंने क्या किया था? पं. नेहरू ने तब अभी तक के सबसे गरीब पृष्ठभूमि के जननेता बने तमिलनाडु के मुख्यमन्त्री स्व. कामराज को मनाया था कि वह पार्टी के अध्यक्ष बनें और कांग्रेसियों को सजग रखने का काम करें। 

1963 में वह कांग्रेस अध्यक्ष बनाये गये और नेहरू ने प्रधानमन्त्री होने के बावजूद अपने को संगठन से उदासीन बना लिया। तब ‘कामराज प्लान’ आया और पार्टी में नई जान फूंकी गई। नेहरू तब चाहते तो अपनी बेटी इन्दिरा गांधी को पुनः कांग्रेस अध्यक्ष बना सकते थे क्योंकि 1959 में इन्दिरा जी पार्टी अध्यक्ष रह चुकी थीं मगर उन्होंने ऐसा न करके बचपन से जवानी तक एक कपड़े की दुकान पर नौकरी करने वाले से मुख्यमन्त्री बने कामराज का चुनाव किया जिससे पार्टी सीधे आम जनता से जुड़ी रह सके। 

कांग्रेस के सामने अब केवल एक ही विकल्प है कि वह पार्टी की संस्कृति बदलने के लिए किसी एेसे नेता का चुनाव करे जिसे परिवार का प्रतिनि​िध न समझा जा सके। इस सन्दर्भ में एक नाम ही सबसे ऊपर आता है और वह कर्नाटक के नेता श्री सिद्धारमैया का है। वह मुख्यमन्त्री रहते हुए कांग्रेस को कर्नाटक में पुनः नहीं जितवा पाये किन्तु उनमें कांग्रेस के रक्त का पूरी तरह ‘डायलिसिस’ करने की क्षमता है। कांग्रेस कार्यसमिति को अब लीक से हटकर फैसला करना ही होगा क्योंकि इसके सिवाय कोई और चारा नहीं है।
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