क्या संसद का शीतकालीन सत्र चलेगा?
भारत की संसदीय प्रणाली में यह बहस 70 के दशक से चलती रही है कि संसद और उच्चतम न्यायालय में से सर्वोच्च कौन है ? परन्तु इसका उत्तर भी तभी मिल गया था कि संसद की सर्वोच्चता कानून बनाने के मामले में शिखर पर है मगर यह संविधान के उस मूल ढांचे में कोई संशोधन नहीं कर सकती जिसकी व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय ने 1973 में केशवानन्द भारती मामले में की थी। इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि संसद नागरिकों को मिले मूलभूत संवैधानिक अधिकारों में कोई संशोधन नहीं कर सकती और भारत राष्ट्र के आधारभूत ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती। जैसे कि भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को यह नहीं बदल सकती। मगर संविधान में सभी धर्मों का समान रूप से आदर करने की बात कही गई है न कि बराबर की दूरी बनाने की । इस मामले में भारत का धर्मनिरपेक्ष ढांचा यूरोपीय ढांचे से अलग माना जाता है।
इसका मतलब यह हुआ कि सत्ता और विपक्ष में बैठे हुए राजनैतिक दलों के नेता गण अपने-अपने धर्म का पालन कर सकते हैं। चूंकि संविधान प्रत्येक धर्म के मानने वाले नागरिक को बराबर के अधिकार देता है अतः सत्ता में बैठे लोगों द्वारा प्रत्येक धर्म का आदर करना कर्तव्य हो जाता है। ये एेसे सवाल हैं जिन पर संसद में अब खुल कर चर्चा होनी चाहिए मगर सवाल यह है कि इसके लिए संसद बाकायदा तरीके से चले। एक तो संसद के सत्र लगातार छोटे होते चले जा रहे हैं और ये छोटे सत्र भी चल नहीं पाते हैं। यह सच है कि संसदीय प्रणाली में संसद पर पहला अधिकार विपक्ष का होता है। मगर विपक्ष का यह कर्तव्य भी बनता है कि वह सरकार की आलोचना में सकारात्मक रुख अपनाये जिससे संसद में कम से कम व्यवधान पैदा हो सके और इसकी उत्पादकता बनी रहे। लोकतन्त्र में संसद केवल वाद-विवाद का स्थल नहीं होती बल्कि यह ठोस निर्णय करने वाली संस्था होती है जिसमें विपक्ष की बराबर की भागीदारी रहती है। संसदीय लोकतन्त्र का विपक्ष महत्वपूर्ण हिस्सा होता है क्योंकि इसकी सक्रिय भागीदारी से ही संसद में विभिन्न सरकारी व विधायी कार्य होता है। यदि एेसा न होता तो सरकार द्वारा पेश किये गये हर विधेयक पर सदन में बहस कराने का प्रावधान न होता। इसकी वजह यही है कि संसद में बहुमत होने के बावजूद सरकार विपक्ष के सुझावों से लाभान्वित हो सके और जनहित में विधेयकों में संशोधन या सुधार कर सके। लोकतन्त्र में सत्ता व विपक्ष दोनों का चुनाव आम जनता ही अपने एक वोट के माध्यम से करती है। इस वोट की कीमत एक बराबर होती है। झोपड़ी में रहने वाले व्यक्ति के वोट की कीमत भी वही होती है जो टाटा या बिड़ला द्वारा दिये गये वोट की। अतः चुने गये प्रत्येक संसद सदस्य की हैसियत भी एक समान होती है । संसद में पहुंचे प्रत्येक संसद सदस्य के अधिकार या विशेषाधिकार भी इसीलिए एक बराबर होते हैं चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का अथवा उसकी पार्टी चाहे कोई भी हो। सत्ता पक्ष में रहने वाले सांसद को भी अपनी ही सरकार से सवाल पूछने का बराबर का हक होता है। आजादी के बाद जब शुरू में संसद में गिने-चुने ही विपक्ष के सांसद होते थे तो सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस के ही सांसद सरकार से सर्वाधिक सवाल पूछते थे। परन्तु ये सारे काम तभी हो सकते हैं जबकि संसद सुचारू रूप से चले। पिछले लगभग तीस साल से देश में राजनीति का जो दौर चल रहा है उसमें संसद में व्यवधान आम बात हो गई है और इस हद तक हो गई है कि पूरे का पूरा सत्र ही व्यवधान की भेंट चढ़ जाता है। विपक्ष और सत्तापक्ष जिद पर अड़ जाते हैं जिसके चलते गतिरोध पैदा हो जाता है और इस गतिरोध के टूटने के आसार खत्म होते चले जाते हैं। इसके साथ ही संसद से थोक के भाव में सांसदों के निलम्बन की नई परंपरा भी शुरू हो गई है। एेसी स्थिति संसदीय लोकतन्त्र में कभी नहीं आनी चाहिए क्योंकि इससे सांसदों को चुनने वाली जनता के अधिकारों का हनन ही होता है। परन्तु हम देख रहे हैं कि एेसा हो रहा है जिसके लिए सत्ता व विपक्ष दोनों को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। निश्चित रूप से यह स्थिति संसदीय लोकतन्त्र के लिए घातक है। भारत चूंकि दुनिया का सबसे बड़ा संसदीय लोकतन्त्र है अतः भारत की संसद में जो उदाहरण बनता है उसका असर विश्व स्तर तक होता है। संसद की गरिमा भी इस सवाल से पूरी तरह बंधी रहती है। प्रश्न यह है कि संसद में व्यवधान की स्थिति को कैसे टाला जाये ? हालांकि संसद व सरकार के भीतर ही इस परिस्थिति को टालने के लिए पूरा तन्त्र विद्यमान रहता है। सरकार में एक संसदीय कार्य मन्त्री होते हैं जिनका मु
ख्य कार्य ही संसद को सुचारू ढंग से चलाने की परिस्थितियों का निर्माण करना होता है। जब किसी विषय या मुद्दे पर व्यवधान लम्बा खिंचता है तो उसमें सरकार व विपक्ष दोनों की ही असफलता छिपी रहती है। इसमें भी कोई दो राय नहीं हो सकतीं कि संसद के दोनों सदनों को व्यवधान रहित ढंग से चलाने में इनके पीठासीन अध्यक्षों की भूमिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण रहती है। लोकतन्त्र में यह भूमिका पूरी तरह निरपेक्ष भाव से निभाने की दरकार रहती है और प्रायः अध्यक्ष एेसा करते भी हैं परन्तु फिर भी सदन में गतिरोध बना रहता है। हमने पिछले वर्षाकालीन सत्र में ही देखा कि बिहार में गहन मतदाता सूची पुनर्रीक्षण(एस.आई.आर) के मुद्दे पर दोनों पक्षों में गतिरोध इस कदर बना कि संसद की कार्यवाही सुचारू ढंग से नहीं चल सकी। विपक्ष मांग कर रहा था कि बिहार में एस.आई.आर पर सदन में बहस या चर्चा हो मगर सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई। इसके पक्ष में उसका तर्क भी वजनदार और ग्राह्य था कि पुनर्रीक्षण चुनाव आयोग करा रहा है जो कि एक स्वतन्त्र व स्वायत्त संवैधानिक संस्था है। अतः उसकी ओर से सरकार को जवाब देने का हक नहीं है। यदि विपक्ष की मांग को स्वीकार कर लिया जाता है तो चुनाव आयोग अपना पक्ष रखने के लिए संसद में कहां से आयेगा । इस तर्क मंे भी वजन था अतः इस मुद्दे पर लम्बा गतिरोध बन गया और संसद की कार्यवाही बाधित होती रही। हालांकि सरकार ने अपना विधायी कार्य तो बहुमत के बूते पर पूरा करा ही लिया मगर विपक्ष की उसमंे भागीदारी नगण्य रही। संसदीय कार्यमन्त्री श्री किरण रिजिजू ने अंग्रेजी दैनिक अखबार को एक साक्षात्कार दिया है जिसमें उन्होंने साफ कहा है कि यदि विपक्ष आगमी 1 दिसम्बर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे मतदाता सूची पुनर्रीक्षण का मुद्दा उठाना चाहेगा तो उसे इसकी इजाजत नहीं मिल सकती क्योंकि मामला चुनाव आयोग के फैसले से जुड़ा हुआ है। हां अगर चुनाव आयोग या चुनाव प्रणाली में संशोधन का विषय हो तो उसे संसदीय नियमों के तहत इजाजत मिल सकती है। इसके साथ ही एस.आई.आर का मसला सर्वोच्च न्यायालय के भी विचाराधीन है ।
एेसी सूरत में संसद में इस विषय पर बहस कैसे हो सकती है ? श्री रिजिजू के अनुसार विपक्ष सदन में व्यवधान पैदा करके अपने लिए ही मुसीबत पैदा करता है क्योंकि वह जनहित से जुड़े अन्य विषयों पर ध्यान नहीं खींच पाता है। देखने वाली बात यह होगी कि संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्ष की रणनीति क्या होगी। जहां तक सरकार का सवाल है तो सत्र से पहले ही उसने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है।