चीन का नया कानून तिब्बत की पहचान के लिए संकट: आईसीटी
वॉशिंगटन, 10 जुलाई (आईएएनएस)। चीन तिब्बत में मानवाधिकारों के उल्लंघन को बढ़ा रहा है और एक नए कानून के जरिए लोगों को जबरदस्ती अपनी संस्कृति में ढालने वाली नीतियों को कानूनी आधार दे रहा है। यह बात तिब्बत के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन के प्रमुख ने कही है।
इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत (आईसीटी) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रयान फियोरेसी ने कहा कि तिब्बत के अंदर हालात अब भी बहुत चिंताजनक हैं। उन्होंने अमेरिका और दूसरे देशों की सरकारों से अपील की कि वे चीन पर दबाव डालें कि वह दलाई लामा या उनके प्रतिनिधियों के साथ बातचीत फिर से शुरू करे।
फियोरेसी ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, "तिब्बत के अंदर स्थिति काफी गंभीर है। चीनी सरकार की ओर से मानवाधिकारों का उल्लंघन बढ़ रहा है।"
उन्होंने चीन के 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस लॉ' का जिक्र किया, जो एक जुलाई से लागू हुआ है। उनके अनुसार, इस कानून के जरिए ऐसी नीतियों को कानूनी मान्यता मिल रही है, जिनका उद्देश्य तिब्बत की अलग पहचान को कमजोर करना है।
उन्होंने कहा, "चीनी सरकार ने कुछ ही दिन पहले एक जुलाई को यह कानून लागू किया है, जो बीजिंग की कई जबरन सांस्कृतिक एकीकरण नीतियों को चीनी कानून का हिस्सा बना देता है।"
फियोरेसी ने कहा कि इस कानून की कई बातें चीन के अपने संविधान और इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स कमिटमेंट्स के खिलाफ जाती हैं।
उन्होंने बताया कि इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत ने इस कानून की ओर दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिश की है। संगठन ने कई देशों की सरकारों, संयुक्त राष्ट्र और धार्मिक नेताओं से अपील की है कि वे इस मुद्दे पर आवाज उठाएं।
उन्होंने कहा, "हमने सरकारों, संयुक्त राष्ट्र और धार्मिक नेताओं से अपील की है कि वे इस कानून के खिलाफ बोलें, दुनिया को बताएं कि चीन तिब्बती पहचान को मिटाने के लिए क्या कर रहा है और बीजिंग से अपनी नीतियां बदलने की मांग करें।"
फियोरेसी यह बात वॉशिंगटन में दलाई लामा के 91वें जन्मदिन के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम के बाद कही। इस कार्यक्रम में अमेरिकी सरकारी अधिकारी, राजनयिक, तिब्बती समुदाय के लोग, नागरिक समाज के प्रतिनिधि और पत्रकार शामिल हुए थे।
उन्होंने कहा कि आज के समय में, जब दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष चल रहे हैं, दलाई लामा का करुणा और अहिंसा का संदेश बहुत महत्वपूर्ण है।
फियोरेसी ने कहा, "आज के वैश्विक और राजनीतिक माहौल में यह बहुत जरूरी है कि हम दलाई लामा के संदेश के मूल विचारों को याद रखें। उनका संदेश दुनिया के अलग-अलग देशों, समुदायों और लोगों के सामने मौजूद कई चुनौतियों का जवाब है।"
उन्होंने कहा कि यह संदेश सरल है, लेकिन इसमें लोगों और देशों के बीच रिश्तों को बदलने की ताकत है।
फियोरेसी ने चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि अमेरिका कई वर्षों से तिब्बती आंदोलन के साथ काम करता रहा है और इस मुद्दे पर वहां की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन रहा है।
उन्होंने कहा, "हम अमेरिका और सभी देशों की सरकारों से अपील कर रहे हैं कि वे चीन से कहें कि वह दलाई लामा या उनके प्रतिनिधियों के साथ बातचीत फिर से शुरू करे, ताकि तिब्बत के मुद्दे का बातचीत के जरिए समाधान निकाला जा सके।"
उन्होंने कहा कि ऐसी बातचीत में तिब्बती लोगों की लंबे समय से चली आ रही चिंताओं को शामिल किया जाना चाहिए और उन्हें वास्तविक स्वायत्तता तथा उनके मूल अधिकार मिलने चाहिए।
दलाई लामा 1959 में तिब्बत छोड़कर भारत आए थे और तब से वह धर्मशाला में रह रहे हैं। उन्हें 1989 में शांतिपूर्ण तरीके से तिब्बत मुद्दे का समाधान खोजने के प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था।
अमेरिका ने 2002 के तिब्बत नीति कानून के तहत तिब्बत मामलों के लिए विशेष समन्वयक का पद बनाया था। यह कार्यालय तिब्बत को लेकर अमेरिकी नीतियों में तालमेल करता है और चीनी अधिकारियों तथा तिब्बती प्रतिनिधियों के बीच बातचीत को बढ़ावा देने का काम करता है।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
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