कचहरी से संसद तक
उज्ज्वल निकम की ज़िंदगी का रुख बदलने वाली दो अहम फोन कॉल, एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से और दूसरी मुंबई पुलिस से। प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ़ फोन किया बल्कि यह भी पूछा कि उनसे मराठी में बात करें या हिंदी में। इसके बाद हुई पूरी बातचीत मराठी में रही। जिसे लेकर निकम का कहना है कि ‘प्रधानमंत्री मराठी बेहद धारा प्रवाह बोलते हैं।’ एक्स पर प्रधानमंत्री मोदी ने निकम के कानूनी करियर की सराहना करते हुए लिखा कि उन्होंने आम नागरिकों के न्याय और गरिमा को मजबूती दी है। मोदी ने कहा-श्री उज्ज्वल निकम की क़ानून और संविधान के प्रति निष्ठा मिसाल है। वह न केवल सफल वकील रहे हैं बल्कि कई अहम मामलों में न्याय दिलाने की लड़ाई की अगली पंक्ति में खड़े रहे हैं। यह कोई पुराना नाता नहीं है। उज्ज्वल निकम की प्रधानमंत्री मोदी से पहली मुलाक़ात 2024 में हुई, जब वे लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी थे। निकम ने कहा-मैं मोदी जी के भाषणों से प्रभावित रहा हूं। वे सच्चे देशभक्त हैं और आम लोगों के मन में भी देशभक्ति भर सकते हैं। इसी कारण मैंने भाजपा ज्वाइन कर चुनाव लड़ा। हालांकि वह चुनाव वे हार गए।
राज्य भाजपा इकाई ने उन्हें मुंबई नॉर्थ-सेंट्रल से लोकसभा चुनाव मैदान में उतारा था, जहां कांग्रेस की वर्षा गायकवाड़ ने उन्हें 16 हज़ार से अधिक वोटों से पराजित कर दिया। साल 2025 में निकम को राज्यसभा के लिए नामित किया गया एक ऐसा फ़ैसला जिसने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी। एक समय के चर्चित विशेष लोक अभियोजक अब राज्यसभा के सदस्य बन चुके हैं। अपने नामांकन पर निकम का कहना है कि ‘भगवान की कृपा है।’ हालांकि विपक्ष ने इस नामांकन को लेकर तीखा हमला किया? कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह नियुक्ति दिखाती है कि सत्ताधारी दल-संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक लाभ के लिए दुरुपयोग कर रहा है। निकम ने भाजपा के लिए परोक्ष रूप से काम किया और अब उन्हें इनाम दिया गया।
इन आरोपों को खारिज करते हुए निकम ने कहा कि उनका नामांकन राष्ट्रपति कोटे से हुआ है और यह साबित करता है कि वे किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि नहीं हैं। उज्ज्वल निकम के नामांकन पर सवाल उठाना अनुचित है। भाजपा से उनके संबंध हो सकते हैं लेकिन इससे उनकी दक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। बतौर लोक अभियोजक उनका रिकॉर्ड बेजोड़ रहा है। 1991 के कल्याण ब्लास्ट से उनकी पहली बड़ी क़ानूनी पारी शुरू हुई लेकिन उन्हें असली पहचान दिलाई मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने। इसके बाद 2003 के गेट-वे-ऑफ इंडिया और जवेरी बाजार जुड़वां धमाके, संगीत जगत के दिग्गज गुलशन कुमार की हत्या, 2024 में उनके कथित हत्यारे संगीतकार नदीम के लंदन से प्रत्यर्पण का मामला, 2006 का खैरलांजी दलित नरसंहार और 2013 का शक्ति मिल्स गैंगरेप केस, ये सभी मुकदमे सुर्खियों में रहे और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गूंजे।
निकम की साख ऐसी थी कि कई मामलों में पीड़ित पक्ष और उनके परिजन ख़ुद उनसे पैरवी करने की मांग करते थे। ताजा उदाहरण दिसंबर में बीड के सरपंच संतोष देशमुख की निर्मम हत्या का है, जब परिवार ने विशेष लोक अभियोजक के तौर पर निकम की नियुक्ति पर ज़ोर दिया। विडंबना यह रही कि इस हत्या में गिरफ्तार मुख्य आरोपी कथित तौर पर एक भाजपा मंत्री का करीबी था, जिन्हें बाद में जनाक्रोश के चलते इस्तीफ़ा देना पड़ा। उज्ज्वल निकम की ज़िंदगी की दास्तान उतनी ही रोचक है जितनी प्रेरणादायी। महाराष्ट्र के जलगांव से ताल्लुक रखने वाले निकम का सपना था कि लोगों के बीच अपने नाम का ‘खौफ’ पैदा करें।
एक घटना ने उनके सोचने के तरीके को बदल दिया और आज भी उन्हें विचलित करती है। वकील के तौर पर वे शुरुआत में सहकारी संस्थाओं के मामलों की पैरवी करते थे लेकिन एक राजनीतिक ताकतवर हस्तक्षेप ने उन्हें अपराध मामलों की ओर मोड़ दिया। हुआ यूं कि एक नगरसेवक, जिस पर दिनदहाड़े एक निर्दोष की हत्या का आरोप था, को अदालत से जमानत मिल गई। निकम के लिए यह गहरा झटका था। उनके अनुसार, ‘उस नगरसेवक के राजनीतिक रिश्ते थे और वही वजह थी कि उसे जमानत मिली।’ निकम ने न केवल उस जमानत को रद्द करवाया, बल्कि इसी घटना ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि अब से वे अपराधियों के खिलाफ मुकदमे लड़ेंगे। उनके शब्दों में ‘मैं चाहता था कि अपराधियों के मन में मेरे नाम का डर बैठे।’
आज हालात यह हैं कि किसी भी हाई-प्रोफ़ाइल केस का ज़िक्र हो और उस पर उज्ज्वल निकम की छाप न हो, ऐसा सोचना भी मुश्किल है। अब तक वे 30 से ज़्यादा फांसी की सजाओं और 600 उम्रकैद की सज़ाओं का श्रेय अपने नाम कर चुके हैं। महाराष्ट्र में किसी भी बड़े अपराध की घटना के बाद पीड़ित परिवारों की पहली मांग होती है उज्ज्वल निकम को सरकारी वकील नियुक्त किया जाए। खुद को वे मज़ाकिया अंदाज में ‘राज्य सरकार का एंटीबायोटिक’ कहते हैं। सच यह है कि जब भी किसी मामले पर जनाक्रोश भड़कता है, निकम की नियुक्ति अक्सर हालात को शांत कर देती है। 26/11 के आतंकवादी अजमल कसाब के खिलाफ मुकदमा लड़ने वाले निकम राज्य सरकारों और नेताओं के सबसे ज़्यादा मांगे जाने वाले अभियोजक रहे हैं।
लेकिन यह राह आसान नहीं थी। छोटे कस्बे से वकालत की शुरुआत करने वाले निकम का मुंबई और फिर दिल्ली तक का सफर काफ़ी संघर्षपूर्ण रहा। 1993 में मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद मुंबई पुलिस का फोन आया, निकम के लिए यह अप्रत्याशित था। उनके मन में सवाल उठा ‘क्यों मैंने मां से यह ज़िक्र किया, उन्होंने घबराकर कहा-मत जाना, तुम्हें मार डालेंगे। स्वतंत्रता संग्राम में भाग ले चुकी उनकी मां की यह प्रतिक्रिया चौंकाने वाली थी, मगर बेटे की सुरक्षा को लेकर उनकी चिंता स्वाभाविक थी। हनुमान जयंती के दिन जन्मे निकम का परिचय हमेशा निर्भीकता से रहा। अंततः वे मुंबई पहुंचे और वहां राज्य पुलिस से मिले, जिनकी कार्यशैली को वे ‘स्कॉटलैंड यार्ड’ जैसी मानते हैं। हालांकि पुलिस अधिकारियों की पहली प्रतिक्रिया उत्साहजनक नहीं थी। निकम के शब्दों में, एक दुबला-पतला लड़का, छोटे कस्बे से आया है, गुमसुम सा दिखता है, ये क्या करेगा। मैं बिल्कुल अंजान था, उन लोगों में मेरी क्षमता को लेकर संदेह था लेकिन अंततः उन्होंने संतोष जताया।
शुरुआती धारणाएं जल्द ही टूट गईं और फिर पीछे मुड़कर देखने की नौबत नहीं आई। उज्ज्वल निकम का जीवन रोचक अनुभवों से भरा पड़ा है, कुछ सुखद, कुछ कटु। कभी मुंबई बम धमाका मामले की सुनवाई के दौरान पूरे दो दशक तक होटल में रहना पड़ा, तो कभी अभिनेता संजय दत्त पर गंभीर धाराएं लगाने के लिए भारी दबाव झेलना पड़ा। बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों की कहानियां हों या अदालत के गलियारों की राजनीतिक निकम के पास हर किस्से का अपना अनुभव है। अब वे एक नए सफर की ओर बढ़ रहे हैं पूर्णकालिक राजनीति के। अदालत से संसद तक का यह रास्ता उनके लिए अनजान जरूर है लेकिन शुरुआत हो चुकी है। कचहरी से संसद तक यही है उज्ज्वल निकम की नई पहचान।