इलेक्ट्रिक कारों से बदलेगा ऑटोमोबाइल बाजार का खेल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह गुजरात के हंसलपुर प्लांट में मारुति सुजुकी मोटर के हाइब्रिड बैटरी इलेक्ट्रोड के लोकल प्रोडक्शन यूनिट का उद्घाटन किया और मारुति सुजुकी की पहली ग्लोबल बैटरी इलेक्ट्रिक एसयूवी, ई-विटारा के एक्सपोर्ट को हरी झंडी दिखाई। यह मॉडल भारत में बनाया जाएगा और यूरोपीय देशों और जापान जैसे प्रमुख बाजारों सहित 100 से ज्यादा देशों में भेजा जाएगा। दुनिया में पैट्रोल और डीजल की महंगाई दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। ऐसे में लोगों द्वारा दूसरा विकल्प खोजना स्वाभाविक ही है। इस वजह से दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है। लोगों की दिलचस्पी भी इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रही है। लोगों की इसी रुची को देखते हुए कई कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों को बनाने में लग गई हैं। भारत की ऑटो इंडस्ट्री आने वाले कुछ सालों में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की भरमार के लिए तैयार है। दरअसल, सरकार की तरफ से एनवायरमेंट फ्रेंडली मोबिलिटी सॉल्यूशंस को बढ़ावा देने के लिए नई नीति लाई गई है। इसी नीति के चलते मारुति सुजुकी, हुंडई, महिंद्रा एंड महिंद्रा और टाटा मोटर्स जैसी बड़ी कंपनियां अलग-अलग सेगमेंट में ग्राहकों की मांग को पूरा करने के लिए नए इलेक्ट्रिक मॉडल लॉन्च करने की तैयारी में हैं। भारत का लक्ष्य 2030 तक 30 प्रतिशत ईवी बिक्री का हिस्सा हासिल करना है। प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियां जैसे मारुति सुजुकी, हुंडई, टाटा, महिंद्रा, किआ और एमजी आने वाले सालों में ईवी क्षेत्र में प्रवेश करने या अपने मौजूदा ईवी प्रोडक्ट लाइनअप को एक्सटेंड करने की तैयारी कर रही हैं।
आजकल हर जगह यही चर्चा है कि इलेक्ट्रिक कारों की बाढ़ ने बाजार का रुख बदल दिया है लेकिन क्या यह बदलाव सिर्फ गाड़ियों तक सीमित रहेगा या फिर पूरी इंडस्ट्री का चेहरा बदल जाएगा?क्या डीजल-पैट्रोल गाड़ियां सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएंगी या फिर ऑटोमोबाइल की दुनिया में कोई और बड़ा बदलाव आने वाला है? 2025 में भारत में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री ने नया मुकाम छू लिया है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 की पहली तिमाही में देश में 35,000 से ज्यादा इलेक्ट्रिक कारें बिकीं। 2023 में पूरे साल 82,000 इलेक्ट्रिक कारें बिकी थीं, वहीं 2025 में यह आंकड़ा 1,10,748 तक पहुंच गया है। यह कुल कार बिक्री का लगभग 4.5 प्रतिशत हिस्सा है। अप्रैल 2025 में टाटा मोटर्स ने 4,436 इलेक्ट्रिक कारें बेची, वहीं एमजी मोटर ने 5,829 यूनिट्स की बिक्री की। टाटा मोटर्स ने अब तक कुल 57,616 इलेक्ट्रिक कारें बेची हैं जो मार्केट का 53प्रतिशत हिस्सा है। एमजी मोटर ने 30,162 यूनिट्स बेची (28प्रतिशत मार्केट शेयर) और महिंद्रा ने 8,182 इलेक्ट्रिक कारें बेची। सिर्फ कार ही नहीं, बल्कि पूरे इलेक्ट्रिक व्हीकल सेगमेंट में भी जबरदस्त ग्रोथ दिखी है। 2025 में भारत में 20 लाख से ज्यादा इलेक्ट्रिक व्हीकल्स बिके हैं, जिसमें दोपहिया, तिपहिया और कारें शामिल हैं। देश में अब तक कुल 61 लाख से ज्यादा इलेक्ट्रिक व्हीकल्स सड़कों पर उतर चुके हैं।
सवाल यह भी है कि डीजल और पैट्रोल गाड़ियों का क्या होगा? ये गाड़ियां पूरी तरह बंद तो नहीं होंगी लेकिन इनकी बिक्री में गिरावट जरूर आ रही है। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स (एसएआईएम) के अनुसार, 2022-23 में डीजल कारों की बिक्री में 10 प्रतिशत की गिरावट आई थी और 2025 में यह ट्रेंड और तेज हो गया है। कई शहरों में पुराने डीजल-पैट्रोल वाहनों पर सख्ती बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक कारों के साथ-साथ ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में टेक्नोलॉजी का रोल भी बढ़ गया है। अब गाड़ियों में स्मार्ट फीचर्स, ऑटोमेटिक ड्राइव, कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी जैसे इनोवेशन देखने को मिल रहे हैं। कंपनियां सिर्फ फ्यूल टाइप नहीं, बल्कि पूरी ड्राइविंग एक्सपीरियंस बदलने पर ध्यान दे रही हैं। बैटरी की क्वालिटी, चार्जिंग स्पीड और रेंज में भी लगातार सुधार हो रहा है।
लोग अब सिर्फ सस्ती गाड़ी नहीं, बल्कि स्मार्ट, इको-फ्रेंडली और फ्यूचर रेडी गाड़ी चाहते हैं। युवा पीढ़ी पर्यावरण के प्रति ज्यादा जागरूक है और इलेक्ट्रिक कारों को स्टेटस सिंबल भी मानती है। इलेक्ट्रिक वाहन से उत्सर्जन से होने वाले वायु प्रदूषण पैट्रोल और डीजल वाहनों की तुलना में कम होता है। बाजार में इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए फाइनेंसिंग और सब्सिडी के विकल्प भी बढ़ गए हैं जिससे खरीदना आसान हो गया है।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत में बिकने वाली हर 10 में से 4 कारें इलेक्ट्रिक होंगी। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में नई नौकरियां, नई टेक्नोलॉजी और नए बिजनेस मॉडल देखने को मिलेंगे। पैट्रोल पंप की जगह चार्जिंग स्टेशन दिखेंगे और गाड़ियों की सर्विसिंग भी बदल जाएगी। कुल मिलाकर, 2025 में डीजल-पैट्रोल गाड़ियां पूरी तरह आउट नहीं होंगी लेकिन उनका दबदबा जरूर कम हो जाएगा। आने वाले समय में इलेक्ट्रिक कारों की बाढ़ के साथ-साथ ऑटोमोबाइल का पूरा खेल ही बदलने वाला है। इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र में हो रही वृद्धि भारतीय वाहन उद्योग और सरकार दोनों के लिए चुनौतियां भी ला रही है। इंपीरियल कॉलेज लंदन और ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के सस्टेनेबल फाइनेंस ग्रुप के अर्थशास्त्री एक अध्ययन में कहते हैं कि भारत के मौजूदा वाहन निर्माताओं पर इसका अलग-अलग असर होगा। टाटा मोटर्स जैसी कुछ कंपनियों को इलेक्ट्रिक वाहन बनाने से फायदा होगा तो वहीं अन्य, आदि को नुक्सान हो सकता है परंतु व्यापक समस्या इस तथ्य में निहित है कि इलेक्ट्रिक वाहन बुनियादी तौर पर इंटर्नल कंबस्चन इंजन (आईसीई) आधारित यानी पैट्रोल-डीजल कारों से अलग होते हैं।
आईसीई कारों की उत्पादन प्रक्रिया कहीं अधिक विस्तृत है जहां मूल्य और लाभ दोनों आपूर्ति शृंखला के अलग-अलग स्तरों पर अर्जित किए जाते हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मूल्य संवर्धन अधिक केंद्रित है। उदाहरण के लिए बैटरियों के उत्पादन में, इसका भारत के वाहन कलपुर्जा क्षेत्र पर काफी प्रभाव पड़ सकता है। सरकार के लिए एक साथ कई और कभी-कभी विरोधाभासी आवेग हैं। पहला भाव निस्संदेह संरक्षणवाद का है जिससे निजात पानी चाहिए। दूसरा, एक स्वाभाविक आवश्यकता देश में कम कार्बन उत्सर्जन वाले वाहनों की जरूरत का है ताकि स्थानीय प्रदूषण और राष्ट्रीय स्तर पर उत्सर्जन में कमी की जा सके। इसी वजह से सरकार न केवल ईवी खरीदने वालों को प्रोत्साहन दे रही है, बल्कि उसने विदेशी ईवी आयात पर भारी शुल्क लगाया है।