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राफेल विमान और चीन?

चीन के साथ तनाव के चलते फ्रांस से उन राफेल विमानों की पहली खेप भारत के लिए चल चुकी है जिनकी युद्धक क्षमता बेमिसाल मानी जाती है और चीन के जे-20 लड़ाकू विमानों पर भारी पड़ती है।
राफेल विमान और चीन?
चीन के साथ तनाव के चलते फ्रांस से उन राफेल विमानों की पहली खेप भारत के लिए चल चुकी है जिनकी युद्धक क्षमता बेमिसाल मानी जाती है और चीन के जे-20 लड़ाकू विमानों पर भारी पड़ती है।

आगामी 29 जुलाई को ये पांच विमान भारत आ जायेंगे जिन्हें वायु सेना में शामिल किया जायेगा। हालांकि इन विमानों को लेकर भारत में भारी राजनैतिक युद्ध भी हुआ मगर इनकी गुणवत्ता पर किसी ने भी सवाल नहीं उठाया बल्कि हकीकत यह है कि इनका चुनाव पिछली मनमोहन सरकार ने ही किया था मगर इनकी उत्पादक कम्पनी डोसाल्ट के साथ सौदे को लेकर कुछ मतभेद पैदा हो गये थे मगर इस सौदे को बाद में अन्तिम रूप नई सरकार आने के बाद दिया गया।

इन हवाई प्रहरियों के आने के बाद भारतीय वायुसेना की शक्ति में निश्चित रूप से ऐसी अभिवृद्धि होगी जिससे दक्षिण एशिया में भारतीय वायु सेना को मात देना किसी भी देश के लिए मुश्किल काम होगा लेकिन भारत शुरू से ही एक शान्ति प्रिय देश है और ये विमान उसने अपनी सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए ही खरीदे हैं परन्तु चीन के सन्दर्भ में हमें यह सोचना होगा कि वह लद्दाख में हमारी ही भूमि मे घुस कर हमें धौंस दिखा रहा है और बार-बार वार्ताओं की मेज पर बैठने के बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं हो रहा है।

जिस प्रकार से चीनी सेनाएं भारतीय क्षेत्र में नियन्त्रण रेखा के समीप निर्माण कार्य कर रही हैं उससे उसकी बदनीयती का अन्दाजा लगाया जा सकता है। फिलहाल चीनी सेनाओं को वापस 2 मई की स्थिति में भेजना हमारा लक्ष्य है और इसी वजह से सैन्य व कूटनीतिक स्तर पर दोनों देशों के बीच वार्ताओं का दौर चल रहा है।

चीन को भारत भूमि से वापस खदेड़ने के लिए हर भारतवासी बेचैन है और इस कदर बेचैन है कि वह विगत 15 जून को लद्दाख की गलवान घाटी में शहीद हुए 20 भारतीय वीर सैनिकों की वीरगति को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता।

चीन की नीयत नियंत्रण रेखा को बदलने की न होती तो अब तक वह पहले की तरह अपनी भूल में सुधार करते हुए वापस चला जाता और कह देता कि नियंत्रण रेखा की अवधारणा में उससे त्रुटि हुई है, परन्तु इस बार चीनी सेनाएं लगातार भारतीय सेनाओं के मुकाबले में नियन्त्रण रेखा पर डटी हुई हैं और उसकी तरफ से सैनिक कमांडर हमारे सैनिक कमांडरों के साथ बातचीत में टालमटोल का रुख अख्तियार किये हुए हैं।

जिस तरह चीन 1962 से लद्दाख के अक्साई चिन इलाके को दबाए हुए है उसे देख कर तो तर्क यह बनता था कि भारत उससे अपना यह इलाका लेने के बारे में बातचीत करे परन्तु उल्टे चीन लद्दाख में हमारे और इलाके को हड़प जाना चाहता है। इस बारे में पूर्व की सरकारें बेशक गलती करती रही हैं और अपनी सदाशयता में चीन के साथ नरम रवैया बनाये रही मगर जिस तरह से चीन ने तिब्बत को पचास के दशक में ही हड़प किया था उसी से उसके बाद की सरकारों की आंखें खुल जानी चाहिए थीं।

हम तब भी नहीं जागे जब 2003 में उससे सम्बन्ध सुधारने के लोभ में हमने तिब्बत को चीन का स्वायत्तशासी अंग स्वीकार कर लिया। तिब्बत और चीन की संस्कृति के बीच आपस में कोई लेना-देना नहीं है। पूरी तरह बौद्ध संस्कृति वाले तिब्बत का भारत के साथ सदियों से रोटी-बेटी का सम्बन्ध रहा और धार्मिक व सांस्कृतिक आदान-प्रदान रहा। इसके बावजूद 2003 में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ऐतिहासिक गलती कर गये और तिब्बत पर चीन का अधिकार स्वीकार कर बैठे मगर अब समय बदल गाया है और भारत की एशिया महाद्वीप में रणनीतिक स्थिति ऐसी है कि चीन का गुजारा हमारे साथ सहयोग से ही है, उसकी आर्थिक महत्वाकांक्षाएं भारत के सहकार के बिना पूरी नहीं हो सकती मगर चीन के बारे में यह भी स्पष्ट है कि वह झांसे में रख कर पीठ पर वार करता है।

दोनों देशों के बीच कहां तो यह तय हुआ था कि 2020 भारत-चीन के बीच सरकारों व लोगों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने का वर्ष इस तरह होगा कि यह सदी भारत-चीन की सदी बने मगर साल के शुरू होते ही चीन ने रंग बदलना शुरू कर दिया और अप्रैल महीने के आखिर तक उसकी सेनाओं ने नियन्त्रण रेखा पर हलचल तेज कर दी।

अब वह चाहता है कि भारत उसे इकतरफा नियन्त्रण रेखा नियत करने की छूट दे दे। यह किसी कीमत पर संभव नहीं हो सकता क्योंकि भारत का बच्चा-बच्चा जानता है कि चीन की छवि भारत में एक आक्रमणकारी देश की है जो पाकिस्तान के साथ मिल कर भारत के खिलाफ षडयन्त्र रचने से भी पीछे नहीं रहता है और भारत के विकास में अवरोध पैदा करना उसकी आदत बन चुकी है।

भारत ने 47 और चीनी एपों पर प्रतिबन्ध लगाने का फैसला करके यही सन्देश दिया है कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है। आज की इस डिजीटल दुनिया में एप पर प्रतिबन्ध लगाने के भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं क्योंकि इससे मनोवैज्ञानिक स्तर पर हस्तक्षेप रोका जा सकता है।

चीन पर दबाव बनाने के लिए जरूरी है कि हम उसे अकसाई चिन की याद दिलाते रहें और पाक अधिकृत कश्मीर इलाके की उसकी परियोजनाओं पर सवालिया निशान लगाते रहें क्योंकि अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन जिस तरह का अनर्गल प्रलाप करता रहता है और वहां के भी कुछ इलाकों को हड़पना चाहता है उससे हमें यही सबक मिलता है कि उसके वादों का कोई मतलब नहीं है। अगर अपने वादों पर चीन टिका रहता तो लद्दाख में वह स्थिति कभी नहीं हो सकती थी जो आज बनी हुई है।
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